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काशी ह‍िन्‍दू व‍िश्‍वव‍िद्यालय के विज्ञानी ने तैयार किया नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण जांच का प्रोटोकाल

By Vns Shailesh Asthana Edited By: Abhishek sharma
Published: Fri, 02 Oct 2026 01:54 PM (IST)

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. कृपा राम सहित देशभर के विशेषज्ञों ने भारतीय नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी ...और पढ़ें

भारतीय नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी हेतु BHU ने बनाया नया प्रोटोकॉल।

भारतीय नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी हेतु BHU ने बनाया नया प्रोटोकॉल।

HighLights

  1. भारतीय नदियों में प्लास्टिक प्रदूषण निगरानी का प्रोटोकॉल तैयार।

  2. BHU के डॉ. कृपा राम ने निभाई अहम भूमिका।

  3. गंगा पुनर्जीवन को मिलेगा वैज्ञानिक आधार, स्वास्थ्य सुरक्षा।

जागरण संवाददाता, वाराणसी। भारतीय नदियों में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण की अब वैज्ञानिक और एकरूप तरीके से निगरानी हो सकेगी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के रसायन विज्ञान विभाग के डा. कृपा राम समेत देशभर के विज्ञानियो ने नदियों में मैक्रो और माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी व आकलन के लिए प्रोटोकाल तैयार किया है। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) के तहत तैयार यह प्रोटोकाल प्लास्टिक प्रदूषण के स्रोत, हाटस्पाट और उसके बहाव के रास्तों की पहचान में मदद करेगा।

इस पहल में बीएचयू के डा. कृपा राम की अहम भूमिका है। टीम में कश्मीर विश्वविद्यालय के प्रो. गुलाम जीलानी, नेशनल इंस्टीट्यूट आफ ओशनोग्राफी, गोवा की डा. महुआ साहा, आइआइटी रुड़की के प्रो. अभयानंद सिंह मौर्य, आइसीएआर-सीआइएफआरआइ के डा. प्रदीप डे, सिपेट की डा. स्मिता मोहंती, सीपीसीबी के जी. त्रिमूर्ति और टेरी के अरुण कंसल समेत विशेषज्ञ शामिल हैं।

एक जैसी वैज्ञानिक पद्धति से होगी जांच
प्रोटोकाल के जरिए नदी के अलग-अलग हिस्सों में प्लास्टिक प्रदूषण का वैज्ञानिक तरीके से आकलन किया जा सकेगा। इससे अधिक प्रदूषित क्षेत्रों को चिह्नित करने, प्लास्टिक के प्रवाह का पता लगाने और नियंत्रण के लिए प्राथमिकता वाले क्षेत्रों का निर्धारण करने में मदद मिलेगी। टीम प्लास्टिक प्रदूषण से जुड़े डीपीआर, परियोजनाओं और शोध प्रस्तावों की समीक्षा के साथ नई तकनीकों और नीतिगत उपायों पर भी मंत्रालय को सुझाव देगी।

क्या हैं माइक्रोप्लास्टिक
डा. कृपा राम ने बताया कि माइक्रोप्लास्टिक पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक कण हैं। ये जल और जलीय जीवों के जरिए खाद्य शृंखला में पहुंचकर मानव शरीर तक पहुंच सकते हैं। इनके संपर्क से सूजन, आक्सीडेटिव स्ट्रेस और हार्मोनल व्यवधान से संबंधित समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में नदी में इनकी मौजूदगी और स्रोत की निगरानी जल गुणवत्ता के साथ जनस्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

गंगा के पुनर्जीवन में मिलेगा वैज्ञानिक आधार
प्रोटोकाल से गंगा में प्लास्टिक प्रदूषण की निगरानी को व्यवस्थित करने और उसके नियंत्रण के उपाय तय करने में मदद मिलेगी। इससे नदी के पारिस्थितिकी तंत्र और जलीय जीवन पर प्लास्टिक के दबाव को कम करने के प्रयासों को वैज्ञानिक आधार मिलेगा। इस प्रोटोकाल को 22 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित नौवें इंडिया इंटरनेशनल वाटर वीक के उद्घाटन सत्र में जारी किया गया। आयोजन का केंद्रीय विषय ‘क्लाइमेट रेजिलिएंट वाटर मैनेजमेंट’ था। इसके निर्माण में एनएमसीजी के अधिकारियों ने भी मार्गदर्शन और निगरानी की।