वाराणसी [कुमार अजय]। घाटों की सीढि़यां फलांग कर सड़क पर हिलोर ले रहा बाढ़ का पानी जैसे-जैसे बस्तियों-बाजारों की ओर बढ़ता आ रहा है। हर साल जल विभीषिका झेलने को अभिशप्त तटवर्ती रिहायशों की बात तो छोड़ें। गंगा घाटों के समानांतर सत्रहवीं-अठारहवीं सदी में बसी शहर की घनी बस्तियों के रहनवारों का रक्तचाप भी उसी अनुपात में बढ़ते हुए ब्रह्मांड (खोपडे़) को सुन्न किये जा रहा है। नौछिंटुओं से तो खैर तआर्रुफ ही नहीं। जिन बुजुर्गवार शहरियों ने देखी है सन 1978 की प्रलयंकारी बाढ़, उसके स्मरण मात्र से उन सबका दिल बैठा जाता है। भूलने की कितनी भी कोशिश करें यादों के किवाड़ों की झिर्रियां बाज नहीं आती हैं।

आंखे खुली रखें या बंद कोई फर्क नहीं पड़ता। खंड प्रलय जैसा हाहाकारी दृश्य दिखाने वाली भयानक तस्वीरें न चाहते हुए भी दिलों-दिमाग पर चस्पा हो जाती हैं। इसी तरह वह भी महीना था सितंबर का। बीच में दो बार उफान मारकर अपने पेटे में सिमट चुकी गंगा ने महीने के मध्य में एक फिर फुफकार लगाई और जब तक कोई उनका मिजाज भांप पाता रौद्ररूपिणी मइया घाटों का सिवान लांघ कर शहर के टोले-मोहल्लों तक घुसती चली आईं। दो दिन तक इस चढ़ाई ने ही शहर की सूरत बदल दी। गोदौलिया उभ-चुभ तो नई सड़क-बेनिया लबे-लब। बाढ़ के पानी में डूबे अस्सी, भदैनी, नगवां तो दिन-रात बस इसी प्रार्थना में लीन कि माई माफ कर बताव..लउटबी कब।

दो दिनों की बढ़ंती व पूरे पखवाड़े की चढ़ंती ने नगर का सारा इतिहास तो बदला ही भूगोल भी बदल कर रख दिया। सीवर के उलट प्रवाह से गुरुबाग तिराहे तक बाढ़ का नजारा। इधर, रामापुरा से कहीं आगे सदानंद बाजार तक जा पहुंचा उफनती गंगा का किनारा। उधर गंगा की उलटी धार से हहरा उठी वरुणा की तल्खमिजाजी तो और भी आपे के बाहर। कोनिया, सरैया, शैलपुत्री, पुराना पुल, ढेलवरिया, नक्खीघाट की बस्तियां तो पूरे डूब में। चौकाघाट, अंधरापुल तक सड़कों पर पानी ही पानी। नतीजतन पूरे हफ्ते ठप पड़ी जीटी रोड पर आवाजाही की रवानी । हर रोज ही गंगा के पार बखरा, खलिहान, पड़ाव, सूजाबाद, कटेसर और इधर सीर गोवर्धन मूड़ादेव, नुआंव मदरवां, नरिया, छित्तूपुर, गढ़वा से तबाही की सूचनाएं? बाढ़ में फंसे लोगों की पीड़ा और मदद पहुंचाने की प्रार्थनाएं। इधर बाकी शहर भी चैन के मूड में कतई नहीं। प्रशासन के साथ दर्जनों सामाजिक संगठनों ने सारा कामकाज रोका और अपने को चौबीस घंटे के मदद अभियान में झोंका। घर-घर से खाना-पानी, राशन, तेल व अन्य सामग्रियों की खेप उठाना और सिर पर लादकर उसे राहत नौकाओं तक पहुंचाना। उधर से बीमारों व जरूरतमंदों को नाव पर लादकर अस्पताल या फिर उनके गंतव्य तक ले जाना। कोई किसी से नाम नहीं पूछता। हर शख्स पीड़ितों की सहायता के लिए उफनती गंगा की लहरों को चुनौती देता, हर कदम खतरे से जूझता।

आज भी याद है गिरजाघर, लक्सा मार्ग के उपवन रेस्ट हाउस को केंद्र बना कर सहायता कार्य में जुटे उन नौजवानों की जीवटता। जिन्होंने पूरे 10 दिनों तक घर का मुंह नहीं देखा। हर पल जूझते रहे बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए फिर भी चेहरे पर थकान या निराशा की एक नहीं रेखा। बाढ़ आई और रिकार्ड अंकित करा कर लौट गई मगर शहर के सजग लोगों और जोशीले नौजवानों ने इतने पर भी कहीं विराम नहीं लिया। बाढ़ के बाद के बिगड़े हालातों के सुधरने तक साफ सफाई के काम में जूझते रहे। गांव-गांव, मोहल्ले-मोहल्ले जाकर लोगों की कुशलक्षेम पूछते रहे। ऐसे ही जुनूनी नौजवानों की एक टोली ने अपने दम पर एक कठिन संकल्प उठाया और हमारे देखते-देखते बाढ़ में वजूद खो चुके बखरा गांव को फिर से बसाकर ही अपने काम को विराम लगाया।

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