200 वर्ष प्राचीन प्रसंग, समय बदला, तकनीक बदली, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन नहीं बदली रामनगर की रामलीला
अनंत चतुर्दशी के बाद रामनगर में 200 वर्षों से चली आ रही रामलीला 31 दिनों तक अपने पारंपरिक स्वरूप में ...और पढ़ें

रामनगर की 200 वर्ष प्राचीन रामलीला: समय और तकनीक के बावजूद अक्षुण्ण परंपरा।
HighLights
रामनगर की रामलीला 200 वर्षों से पारंपरिक रूप में जारी है।
आधुनिकता के बावजूद लीला का स्वरूप अपरिवर्तित रहा है।
यूनेस्को ने इसे विश्व सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है।
शैलेश अस्थाना, जागरण, वाराणसी।अनंत चतुर्दशी के बाद लगातार 31 दिनों तक शाम ढलते ही गंगा की ओर से आती हवा के साथ रामनगर की गलियां रामकथा के रंग में डूबने लगती हैं। कहीं से जय श्रीराम का उद्घोष सुनाई पड़ता है तो कहीं लोग लीला स्थल की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं। भीड़ में बुजुर्ग होते हैं तो महिलाएं और बच्चे भी।
मोबाइल थामे नई पीढ़ी की संख्या भी कम नहीं। हर साल, साल-दर-साल, यहां की लीला के दर्शकों के चेहरे भले बदल जाते हों, लेकिन कथा, पात्र और प्रसंगों के साथ मंचन, भाव, आस्था और परंपरा की अजस्र धारा 200 वर्षों से वैसे ही निरंतर बहती चली आ रही है। लीला की आत्मा आज भी वैसी ही है।

आज जब दुनिया में मनोरंजन के साधन बदलते गए, पर्दे छोटे होते-होते हथेली तक पहुंच गए, कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने कल्पना की सीमाएं बदल दीं, तब भी रामनगर की रामलीला ने अपने स्वरूप को आधुनिकता की दौड़ में नहीं बदला। यहां रामकथा किसी बंद सभागार के मंच पर नहीं, बल्कि रामनगर के अलग-अलग स्थलों पर अपने पारंपरिक विस्तार के साथ जीवंत होती है। स्थान बदलते हैं तो प्रसंग बदलता है और दर्शक भी उसके साथ चलते हुए कथा का हिस्सा बन जाते हैं। पूरा नगर 10 किमी के क्षेत्रफल में रंगमंच में बदल जाता है।
केंद्र में उपकरण नहीं पात्र, प्रकाश नहीं भाव
रामनगर की रामलीला की यही सबसे बड़ी खूबी है। अयोध्या से लेकर जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी और लंका तक कथा के प्रसंगों के साथ पूरा रामनगर 10 किमी के क्षेत्रफल में मानो एक विशाल रंगमंच में बदल जाता है। न भव्य सेट की जरूरत, न चकाचौंध करती रोशनी की। पेट्रोमैक्स के प्रकाश में पात्रों की पारंपरिक वेशभूषा, संवादों का ठहराव और आस्था से भरे दर्शकों के बीच रामकथा अपना प्रभाव छोड़ती है।

रामनगर की रामलीला ने तकनीक को अपनी पहचान नहीं बनने दिया। यहां कथा के केंद्र में उपकरण नहीं, पात्र हैं, प्रभाव के केंद्र में प्रकाश नहीं, भाव है। आधुनिक मनोरंजन जहां दर्शक को स्क्रीन से बांधता है, वहीं रामनगर की रामलीला दर्शक को घर से बाहर निकालकर कथा की यात्रा पर ले जाती है।
बुजुर्ग स्मृतियों के साथ जेन-जी तक हस्तांरित हो रही परंपरा
समय के साथ पीढ़ियां जरूर बदली हैं। पहले दादा अपने पोते को लीला दिखाने लाते थे, आज वही पोता अपने बच्चों का हाथ थामे वहां पहुंचता है। किसी के लिए यह बचपन की स्मृति होती है तो किसी के लिए पहली बार रामकथा को इतने निकट से देखने का अनुभव। बुजुर्ग प्रसंग समझाते हैं और बच्चे सवाल पूछते हैं। इस संवाद में ही परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुंच जाती है।

शायद इसी कारण बदलते समय में भी इसका आकर्षण कम नहीं हुआ। यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की उस सांस्कृतिक स्मृति का जीवंत दस्तावेज है, जिसमें परंपरा किसी संग्रहालय में बंद चीज नहीं, बल्कि हर साल लोगों के बीच फिर से सांस लेती है। कैलेंडर की तिथियां बदलती रहीं, चेहरे बदलते रहे, देखने के साधन बदलते रहे; लेकिन रामनगर में रामकथा की लौ उसी तरह जलती रही। युग बदला, समय बदला, तकनीक बदली, पीढ़ियां बदलीं, लेकिन नहीं बदली आज भी रामनगर की रामलीला। यूनेस्को ने इसे विश्व सांस्कृतिक विरासत का दर्जा दिया है।
