वाराणसी : भारत में सदियों से खेसारी (लतरी) की दाल को लेकर भ्रांति फैली हुई है कि इसके सेवन से लकवा (लथाइरिजम) होता है। इसी भ्रांति को संज्ञान में लेते हुए खेसारी को भारत में प्रतिबंधित कर दिया गया। हालांकि हाल ही में हुए एक शोध में सिद्ध हुआ कि लतरी के सेवन से लकवा नहीं होता। यह सिर्फ भ्रम है। आइएमएस बीएचयू के न्यूरोलाजी विभागाध्यक्ष प्रो. विजय नाथ मिश्र के हालिया शोध में यह बात उभर कर सामने आई है। प्रो. मिश्र ने पूर्वी उत्तर प्रदेश व पश्चिमी बिहार के 16 जिलों में 'खेसारी से लकवा' को केंद्र में रखकर शोध किया। उनका यह शोध अमेरिका के प्रतिष्ठित शोध जर्नल 'न्यूरोलाजिकल रिसर्च' के अक्टूबर अंक के लिए स्वीकृत भी हो गया है।

पांच सौ परिवारों पर शोध

उक्त 16 जिलों के लगभग पांच सौ परिवारों के बीच प्रो. मिश्र ने सर्वे किया। परिवार के सभी सदस्य कई दशकों से खेसारी का सेवन कर रहे हैं लेकिन किसी को लकवा नहीं है। हालांकि खेसारी खाने वाले परिवारों का सिर्फ एक सदस्य लथाइरिजम पीड़ित मिला लेकिन जांच में यह स्पष्ट हुआ कि इसका कारण खेसारी नहीं थी। रोगी के अन्य रिश्तेदारों से भी उनके परिवार में लकवा की शिकायत नहीं मिली जबकि वे जीवन पर्यत खेसारी ही खाते रहे हैं।

बोवा जहर का भय : प्रो. मिश्र बताते हैं कि लोगों के बीच भ्रम फैलाया गया कि खेसारी की दाल में 'बोवा जहर' होता है। यही लथाइरिजम के लिए मुख्य कारक है। उन्होंने बताया कि जहां वर्षो से सूखा पड़ रहा हो या पानी की कमी हो वहीं उपजी खेसारी में बोवा की आशंका रहती है लेकिन सिंचाई की समुचित व्यवस्था और पर्याप्त पानी हो तो फसल अच्छी और पौष्टिक होती है।

सस्ती और जल्दी तैयार होने वाली फसल : खेसारी अन्य दलहनों की तुलना में अपेक्षाकृत सस्ती होती है। यह गरीबों के बजट में आती है। फसल बहुत जल्दी और बिना तामझाम के तैयार भी हो जाती है। भारत के कई पड़ोसी देशों में इस दाल को सरकारी मंजूरी है। यह ईधन, मसाले आदि की बचत में भी भूमिका निभाती है। कारण कि इसमें प्राकृतिक रूप से मसाला और नमक मिला होता है।

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