अश्विनी कुमार, उन्नाव

अपने स्वाद से देश-देश में रुतबा गालिब करने वाला इलाहाबादी अमरूद फल पंट्टी में थाईलैंड से मात खा रहा है। कम समय में तैयार होने के चलते यह बगान मालिकों की पहली पसंद बन रहा है। करीब पांच साल पहले इस क्षेत्र में आई इसकी पौध अब मलिहाबाद से लेकर अचल गंज तक की अमरूद की फल पंट्टी में थाईलैंड की पौध लगाई जा रही है। इतना ही नहीं खूबसूरती और कम बीजों के चलते बाजार में इसकी मांग भी बहुत हैं। फल पट्टी में इस साल करीब 4 हजार पौधे लगाए गए हैं। हालांकि जूस कंपनियों के लिए बागवानी एवं उपोषण केंद्र रहमान ख्रेड़ा लखनऊ की प्रजाति ललित पहली पसंद बना हुआ है।

आम व अमरूदों के बागानों के लिए मशहूर लखनऊ के मलिहाबाद,काकोरी, माल, उन्नाव के हसन गंज सफीपुर, सिकंदर पुर कर्ण अचलगंज, सफीपुर का परियर क्षेत्र कानपुर के जाजमऊ तक फल पंट्टी के तौर पर घोषित हैं। इसमें मलिहाबाद से लेकर सफीपुर अपने दशहरी आमों के लिए तो सिंकदपुर कर्ण के अचलगंज. हड़हा, सिकंदरपुर सरोसी ब्लाक से परियर क्षेत्र कानपुर के जाजमऊ तक गंगा की कटरी तक का क्षेत्र अपने स्वादिष्ट अमरूदों के लिए मशहूर है। इन क्षेत्रों में करीब हजारों हेक्टेयर में अबतक इस पूरी अमरूद बेल्ट पर लाल गूदे वाले ललित तथा हरे रंग के ज्यादा गूदेवाले इलाहाबादी सफेदा प्रजाति का कब्जा था। इसके अलावा बड़े आकार के हरे रंग वाला लखनऊ 49 मीडियम साइज वाले संगम प्रजाति का कब्जा था। लेकिन अब इनकी जगह थाईलैंड की छोटे बिना बीज वाले अमरूद की प्रजाति ले रही है। नए बगानों में बगान मालिकों के लिए यह पहली पसंद बनी है। नर्सरी मालिकों की माने तो तेजी इस पौध की मांग बढ़ी है। अमरूद बेल्ट में 4000 पौधे बेचे गए हैं।

एक साल में देता है फल

नर्सरी मालिकों का माने तो इसके पसंद होने का सबसे बड़ा कारण इसका कम समय में उत्पादन देना है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पौध का आयात तथा निर्यात करने वली मलिहाबाद की नफीस नर्सरी के मालिक सबीउल हसन का कहना है कि जहां ललित व इलाहाबादी सफेद तैयार होने कम से कम तीन साल लगता है। वहीं थाई चीनी अमरूद की यह प्रजाति एक साल में पूरा फल देने लगती है। यही कारण है कि यह उन क्षेत्रों व्यापारिक पेड़ कहा जाता है। उनका कहना है उन्होंने करीब चार हजार पौधे बेचे हैं। इसकी मांग बढ़ रही है। उनका कहना है कि लखनऊ से सीधी थाइलैंड की सीधी फ्लाइट होने से वहां से आराम से इसकी आपूर्ति हो जा रही है। अपर उद्यान अधिकारी आरबी वर्मा का कहना है कि अभी यह बगानों में पूरी तरह नहीं छाया है। बगानों दो तीन पेड़ लगाकर लोग टेस्ट कर रहे हैं। जल्दी फल देने के कारण इसको पसंद किया जा रहा है। हजारों हेक्टेयर में फैले अमरूद की बगान में इसकी हिस्सेदारी अभी तक दो चार हेक्टयर तक ही सीमित है।

जूस कंपनियों में आज ललित पहली पसंद

भले ही जल्दी फल देने के कारण थाई अमरूद फल पंट्टी में जगह बना रहा है लेकिन कंपनियों तथा राष्ट्रीय स्तर ललित व इलाहाबादी सफेदा की ही मांग है। लाल गूदे वाले ललित जूस कंपनियों की पहली पसंद है।

हालांकि ज्यादा लाइफ देशी प्रजाति की

श्री वर्मा का कहना है कि कलमी अमरूदों का बगान 20 से 25 साल तथा देशी अमरूदों का 30 से 35 साल तक चलता है। इसलि इनकी संख्या ज्यादा है। थाई अमरूद अभी यहां लगाए जा रहे। यहां इनके बारे मेंअभी से कहना मुश्किल है।

यह प्रजातियों का हाल

इलाहाबादी सफेदा : सफेद रंग, बीज कम, ज्यादा गुदा, बड़ा साइज, तीन साल में फल देता है।

ललित: गूदा लाल होने से ललगुदिया के नाम से मशहूर, बड़ा आकार, रसीला, फल तीन साल में

लखनऊ 49: बड़ा साइज हरा रंग, मीटा स्वाद

फल 2- 2.5 साल में

संगम: मीडिय साइज हर कलर जिले में कम क्षेत्र फल

थाई: एक साल में फल, आकार छोटा, देखने में खूबसूरत, बीज की संख्या न के बराबर।

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