जासं, सोनभद्र : सनातनी व्यवस्था के बहुत सारे तौर-तरीके हमारी जिदगी के लिए जरूरी हैं जो हमें सुरक्षित और स्वस्थ रखेंगे। ये ज्ञान आज लोगों को कोरोना से हो रहा है। आप अपने घर को घर समझें। ये बातें घर के गमलों में लगे पौधों में पानी देते हुए गीतकार डा. रचना तिवारी ने साझा कीं।

उन्होंने कोरोना महामारी के दौर में लोगों को घरों में रहते हुए भी बहुत कुछ करने की अपील। बताया कि खुद घर के कामों को अच्छे प्रबंधन में बांट कर करें, चाहे सफाई हो, चाहे बागवानी हो, संगीत सुनें, किताबें पढ़ें, कुछ लिखें, आपस में बैठकर पुराने संस्मरण पर चर्चा करें। कहती हैं कि मैंने कभी भी बाजार को अपने जीवन का हिस्सा नहीं बनाया। इसलिए हर हाल में मस्त रहती हूं। आजकल (पति और बेटे के साथ) घर का सारा काम बिना कामवाली के, संगीत सुनना, गमलों में पानी और सबसे ज्यादा कुछ न कुछ लिखती हूं और अमृता प्रीतम को और मैक्सिम गोर्की का जीवन पढ़ रही हूं। वक्त मेरे लिए कम पड़ जाता है।

डा. तिवारी ने कहा कि कोरोना महामारी के वैश्वीकरण ने भारत बंद के दौरान एक अजीब समस्या को जन्म दिया है। लोगों को घरों में रहना अजीब लग रहा है। वक्त नहीं कट रहा है चाहे वो पुरुष हों या महिला अथवा बच्चे। परिवर्तित भारत में लोग आकर्षण और अंधाधुंध कमाई के चक्कर में खुद की जमीन को खोते जा रहे थे। बिल्कुल अलग तरह का बाजारू परिवेश लोगों की जिदगी में शामिल हो चुका था। यहां तक कि घरों में खाना भी ऑनलाइन आने लगा था। ऐसी दशा में कोरोना ने लोगों को अपनी जमीन दिखाने का काम भी किया है।

भागदौड़ के आकर्षित करने वाले जीवन में लोग अपने बच्चों को संस्कारहीन कर रहे थे। पीढियां पूर्णरूप से निरंकुश जीवन जीने लगीं थीं लेकिन आज कोरोना जैसी विषाणु जनित बीमारी ने परिवार को एक साथ रहने का, सुख-दुख समझने का, एक-दूसरे के करीब आने का, परिस्थितियों में ढलने का, नियंत्रित रहने का एक अवसर देकर कहीं न कहीं पुरानी संस्कृति का आभास कराया है।

Posted By: Jagran

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