पढ़ाई के साथ खेती में कमाल, सिद्धार्थ नगर की सौम्या ने वैज्ञानिक तरीके से उगाई कालानमक की फसल; देश-विदेश तक पहुंचा चावल
सिद्धार्थनगर की सौम्या तिवारी ने आधुनिक सोच और वैज्ञानिक तकनीकों से कालानमक चावल की खेती में क्रांति ला दी है। ...और पढ़ें
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HighLights
सौम्या ने कालानमक चावल की खेती को आधुनिक बनाया।
वैज्ञानिक तकनीक और बाजार समझ से उत्पादन बढ़ाया।
गांव की महिलाओं और पुरुषों को रोजगार दिया।
जागरण संवाददाता, सिद्धार्थनगर। नई पीढ़ी यानी जेन जी की पहचान आधुनिक सोच, नए प्रयोग और अवसरों की तलाश से जुड़ी है। बर्डपुर ब्लाक के बर्डपुर नंबर सात के टोला तेनुहवा की सौम्या तिवारी ने इस सोच को खेती में उतारकर अलग उदाहरण प्रस्तुत किया है। सिद्धार्थ पब्लिक स्कूल, थरौली शाखा में विज्ञान विषय से इंटर की पढ़ाई कर रहीं सौम्या संसाधनों की कमी और अवसरों के अभाव को कोसने के बजाय स्वयं बदलाव की राह बना रही हैं।
पढ़ाई के साथ पैतृक खेती संभालकर उन्होंने कालानमक चावल की उन्नतशील खेती को नई पहचान दी है। आज देश-विदेश के व्यापारी उनके खेत की उपज खरीदने के लिए संपर्क कर रहे हैं। सौम्या ने साबित किया है कि खेती केवल परंपरागत काम नहीं, बल्कि आधुनिक तकनीक, मेहनत और बाजार की समझ के सहारे रोजगार और उद्यम का सशक्त माध्यम भी बन सकती है।
सौम्या पिछले पांच वर्षों से अपने पिता करुणाशंकर तिवारी के साथ खेती संभाल रही हैं। पहले उनके पिता पांच से दस बीघा में कालानमक की खेती करते थे। सौम्या के जुड़ने के बाद इसका दायरा बढ़कर करीब 45 बीघा यानी 15 एकड़ तक पहुंच गया। उन्होंने वाराणसी स्थित अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (इरी) की कार्यशाला में प्रशिक्षण प्राप्त किया।
वैज्ञानिक तकनीक और पारंपरिक विधियों का समन्वय करते हुए वह बीज शोधन, खेत की उर्वरा शक्ति और पानी के उचित प्रबंधन पर ध्यान देती हैं। खेत की जुताई की जिम्मेदारी पिता संभालते हैं, जबकि खेती की तकनीकी प्रक्रिया में सौम्या सक्रिय भूमिका निभाती हैं।
बाजार में बढ़ी पहचान, कीमत में भी उछाल
पहले कालानमक चावल करीब 10 हजार रुपये प्रति क्विंटल बिकता था। क्रेता-विक्रेता सम्मेलन में भाग लेने के बाद अब 12 से 13 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक कीमत मिल रही है। सौम्या प्रतिवर्ष करीब 25 से 30 लाख रुपये का चावल बेच रही हैं। वर्ष 2023 में यह कारोबार लगभग 20 से 22 लाख रुपये का था। अब देश-विदेश के व्यापारी उनसे संपर्क कर रहे हैं। इरी के वैज्ञानिक भी समय-समय पर उनके खेत का निरीक्षण करते हैं। वह कालानमक चावल के आटे से कुकीज बनाने का प्रशिक्षण भी ले रही हैं।
खेती से रोजगार, गांव की महिलाओं को सहारा
सौम्या खेती में रोगों से बचाव के लिए वैज्ञानिकों की सलाह के अनुसार पारंपरिक उपायों का प्रयोग करती हैं। दही के घोल, नीम और खली के उपयोग की जानकारी भी रखती हैं। खेती के काम में गांव की 15 महिलाओं और दो पुरुषों को रोजगार उपलब्ध करा रही हैं। सौम्या की पहल जेन जी के लिए प्रेरक उदाहरण है। जिस उम्र में अधिकतर युवा पढ़ाई के बाद नौकरी के विकल्प तलाशते हैं, उस उम्र में वह पढ़ाई के साथ खेती को भी नई दिशा दे रही हैं।
उनकी कोशिशों से दूसरे युवा भी कालानमक की खेती की संभावनाओं की ओर आकर्षित हो रहे हैं। उन्होंने दिखाया है कि परिस्थितियों को कोसने के बजाय अपनी मेहनत और आधुनिक सोच से अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
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