सिद्धार्थनगर : शिवपति इंटर कालेज, शोहरतगढ़ के प्रधानाचार्य डा.नलिनी कांत मणि त्रिपाठी ने कहा कि स्वाधीनता संग्राम में संघर्ष करने वाले सभी वीर और वीरांगनाएं , असाधारण रूप से साहसी, और दूर-द्रष्टा थे। इस संग्राम में, देश के सभी क्षेत्रों, समाज के सभी वर्गो और समुदायों के लोग शामिल थे। वे चाहते, तो सुविधापूर्ण जीवन जी सकते थे। लेकिन देश के प्रति अपनी अटूट निष्ठा के कारण,उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे एक ऐसा स्वाधीन और प्रभुता-संपन्न भारत बनाना चाहते थे, जहा समाज में बराबरी और भाई-चारा हो। हम भाग्यशाली हैं कि हमें ऐसे महान देशभक्तों की विरासत मिली है। उन्होंने हमें एक आजाद भारत सौंपा।

देश का प्रत्येक वयस्क एक मतदाता के रूप में सरकार बनाकर भारत भाग्य विधाता कहा जाता है। यही वयस्क मतदाता अपने प्रतिनिधि या भावी प्रतिनिधि से अपनी मांगों को मानवता है। व्यक्तिगत मांग पूरी न होने पर वह नाराज हो जाता है। आज प्रत्येक व्यक्ति शासन से प्राप्त होने वाली सुविधाओं को पाने के लिए मुखर है। अपने आस-पड़ोस की स्वच्छता, स्वास्थ, शिक्षा, यातायात नियम के लिए सरकार को जिम्मेदार मानकर सामाजिक सरोकारों से अपने को अलग मान रहा है। आज के 75 साल पहले हमारे पास अपना कोई संविधान नहीं था। विदेशी शासक हमें शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित करते थे। तब हमें भारत भाग्य विधाता कोई नहीं कहता था। लेकिन उस समय हम में सामाजिकता की भावना थी। 1857 का प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन हो, नमक आंदोलन हो या फिर भारत छोड़ो आंदोलन। हमारा लक्ष्य एक था। स्वाभिमान की सुरक्षा, देश के प्रति समर्पण का भाव था। वह आज नहीं दिखाई पड़ता है। परंतु स्वाधीनता प्राप्त के बाद स्वाधीनता संग्राम के आदर्श जैसे विलुप्त हो गए हों। इसे फिर जागृत करने के लिए सरकार अमृत महोत्सव का आयोजन कर रही है। हमें आजादी दिलाने वाले सभी शहीदों को सम्मान पूर्वक याद करना और उनके कार्य व्यवहार से प्रेरणा लेना हमारा कर्तव्य है। हमें अपने स्वाधीनता संग्राम सेनानियों से प्रेरणा लेकर सामाजिक और राष्ट्रीय दायित्वों का पालन करना चाहिए।

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