सिद्धार्थनगर: सरकार की मंशा साफ है। वह नहीं चाहती कि भारत संचार निगम लिमिटेड का नेटवर्क अबाध गति से चलता रहे। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि जुलाई 2018 से लेकर अब तक विभाग को एक भी फूटी कौड़ी नहीं मिली। अक्टूबर 2018 से डीजल के लिए भुगतान भी बंद है। 18 स्टाफ के सापेक्ष सिर्फ सात के भरोसे काम चल रहा है। शासन की उपेक्षापूर्ण रवैया से कर्मचारी सिर्फ दिन काट रहे हैं।

विभागों में लगे टेलीफोन शो-पीस बन चुके हैं। जहां लाइन खराब हो रही है वहां ठीक करने में सप्ताह भर से अधिक समय लग जा रहे हैं। नेटवर्क की समस्या से मोबाइल उपभोक्ता भी त्रस्त हो चुके हैं, ऐसे में विभाग से भरोसा क्यों न उठे? सरकारी कामकाज भी बीएसएनएल पर ही निर्भर है। बैंकों के काम भी ब्राड बैंड से चलता है। लेकिन सब कुछ ठप है। बैंक का सर्वर न चलने से बैंक कर्मी परेशान तो सरकारी डाटा फीड करने के चक्कर में सरकारी कर्मचारी। एसएसबी के जवान भी आए दिन चक्कर काट रहे हैं। आखिर ऐसा कब तक? पूरे जिले में 46 बीटीएस यानी बेसिक ट्रांन्जेक्शन सर्विस लगे हैं। इनको संचालित करने के लिए 27 टावर लगे हैं। यह टावर भी जब बिजली की सुविधा मिलती है तभी चलते हैं। और बिजली है कि भरपूर मिलती नहीं। कर्मचारी बताते हैं कि पहले हर माह चार हजार आठ सौ लीटर डीजल के लिए पैसा शासन से एडवांस मिल जाता था, लेकिन अक्टूबर से वह भी बंद है। पूरे जिले में ठेकेदारी प्रथा के तहत 44 कर्मचारी लगाए गए थे, जिन्हें दो हजार मानदेय मिलता था। अब वह भी बीते नवंबर से बंद है। ये कर्मचारी भी अब विभाग के कार्यों से किनारा कस लिए हैं।

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संसाधन लगातार घटते जा रहे हैं, इसके कारण अबाध गति से उपभोक्ताओं को सेवा देना मुश्किल हो रहा है। एनएच के निर्माण कार्य में करीब पांच सौ जगह केबल अब तक कट चुके हैं। लेबर से काम कराया गया है, लेकिन इसके भी पैसे नहीं मिले। उच्चाधिकारियों को अवगत करा चुका हूं कि उपभोक्ताओं को बेहतर सुविधा के लिए संसाधन चाहिए, लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हो रही है।

दुर्गेश सिंह

एसडीओ, सिद्धार्थनगर

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Posted By: Jagran