इटवा, सिद्धार्थनगर : महाशिवरात्रि को लेकर बिस्कोहर की तैयारियां बेजोड़ हैं। बाहर के सभी लोग घर आ चुके हैं। आएं भी क्यों न शिव उनके आराध्य जो ठहरे। स्वयं विषपान कर जग का कल्याण करने वाले भगवान नीलकंठ की आस्था में ही कभी इटवा तहसील के बिस्कोहर कस्बे की स्थापना हुई। यहां अभी भी सर्वाधिक संख्या में शिवालय हैं। कभी यह 365 मंदिर व कुओं का कस्बा था। उतने मंदिर व कुएं अब देखने को नहीं मिलते, मगर उसके साक्ष्य अब भी मौजूद हैं।

सोमवार को बिस्कोहर कस्बा शिव के बेलपत्र से नहा उठेगा। कस्बे के लोग अभी से बेर, बेलपत्र, भांग, धतूरा, दूब आदि एकत्रित करने लगे हैं। भोर से ही सभी शिवालयों के घंटे बजने लगेंगे और महादेव के जयकारे से वातावरण गूंज उठेगा। वर्तमान में इसकी पहचान थोड़ी धूमिल भले हो गई हो, मगर ऐसा भी समय था, जब बंगाल, कलकत्ता, दिल्ली, मुम्बई, नेपाल के कोने-काने से यहां आकर लोग साल-साल भर रहते थे। वह मंदिरों में पूजा करते थे। वर्ष पूरा होने पर वह यहां से चले जाते थे। तमाम श्रद्धालु तो यहीं के निवासी हो गए और अपना कारोबार करने लगे।

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कैसे पड़ा बिस्कोहर नाम

मान्यता थी श्रद्धालु एक कुएं के पानी से स्नान करे और फिर वहीं से जल भर मंदिर में जलाभिषेक करे। दूसरे दिन ऐसा ही दूसरे मंदिर पर करें। साल भर में 365 मंदिरों की परिक्रमा पूरी हो जाती थी और ऐसा करने वाले को इच्छित फल मिलता था। तमाम कुष्ठ व असाध्य रोगियों को अपनी पीड़ा निजात मिला और बाद में कस्बे का नाम बिस्कोहर पड़ा।

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रहस्य है मंदिरों की स्थापना

मंदिरों की स्थापना यहां कब हुई इसके विषय में लोग ठीक से बता पाने में विफल हैं। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने कर वसूलने के लिए यहां जमींदार नियुक्त किए। उनके द्वारा भी कस्बे के दक्षिणी हिस्से में कुछ मंदिरों का निर्माण किया गया है। कस्बे के पश्चिम स्थित एक मंदिर ऐसा है, जिस पर अलाउद्दीन खिलजी के नाम का जिक्र है। ऐसे में लोग यह भी बताते हैं कुछ मंदिर उनके द्वारा स्थापित किए गए हैं।

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कब उठेगा रहस्य से पर्दा

डा. जगदीश गुप्ता ने बताया कि यहां के व्यापारी शैव संप्रदाय से जुड़े थे। उन्होंने शिव मंदिरों की स्थापना कराई। यहां का इतिहास गजेटियर में भी दर्ज है। डा. चंद्र प्रकाश गुप्ता कहते हैं कि बुजुर्गो से सुना है कि आबादी बसने के पूर्व भी कस्बा आबाद था। अभी भी लोग घर बनवाने के लिए नींव खोदते हैं तो कई चीजें ऐसी मिलती है जो इतिहास की ओर इशारा करती हैं। नर्वदेश्वर ¨सह का कहना है कि बीस फिट जमीन के नीचे विशालकाय ईटों के मिलने से प्रतीत होता है कि जमीन के नीचे कई राज दफन हैं।