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मैं श्याम की नगरी ‘श्यामली'...अब शामली हूं! सनातन सभ्यता, शौर्य और अध्यात्म की अमूल्य स्मृतियां सहेजे हूं मैं

By Akash Sharma Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Sun, 27 Sep 2026 06:36 PM (IST)

पश्चिमी उत्तर प्रदेश का शामली शहर सनातन सभ्यता, शौर्य और अध्यात्म की अमूल्य स्मृतियों को संजोए हुए है। यह श्रीकृष्ण ...और पढ़ें

(प्रतीकात्मक फोटो)

(प्रतीकात्मक फोटो)

HighLights

  1. पश्चिम में यमुना तो पूर्व में गंगा की पावन धारा, श्रीकृष्ण की विश्राम स्थली और 12 ज्योतिर्लिंगों का पावन धाम हैं

  2. दानवीर कर्ण की तपस्थली, 1857 की क्रांति का साक्षी व किराना घराने और चीनी उद्योग की ऐतिहासिक धरोहर

जागरण संवाददाता, शामली। मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पावन धरा, अतीत के पन्नों में ‘श्यामली' और जन-जन के हृदय में बसने वाली ‘श्याम नगरी' शामली हूं। मेरा आंचल सनातन सभ्यता, शौर्य और अध्यात्म की अमूल्य स्मृतियों से सुशोभित है। यदि मानचित्र के धरातल पर मेरी भौगोलिक संरचना को निहारें, तो मेरी पश्चिमी सीमा पर यमुना की धारा बहती है, जो मुझे हरियाणा राज्य की सीमा से जोड़ती है।

वहीं, मेरी पूर्वी दिशा में गंगा नहर के रूप में मोक्षदायिनी मां गंगा का अमृततुल्य जल मेरी माटी को उर्वरता और शीतलता प्रदान करता है। उत्तर में सहारनपुर तथा दक्षिण में बागपत और मुजफ्फरनगर की सीमाएं मुझे स्पर्श करती हैं। अब अपने जनपद स्वरूप में 15 वर्ष पूर्ण कर 16वें वर्ष में प्रवेश कर रही हूं।

मेरा इतिहास द्वापर युग की पौराणिक गाथाओं से हैं। जब युधिष्ठिर की धर्मसभा के बाद महाभारत युद्ध का बिगुल बजा, तब भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनापुर से कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान कर रहे थे। उस यात्रा के दौरान प्रभु ने यहां बरगद और बरने के वृक्षों की सुखद छाया में विश्राम किया था तथा यहां के अति प्राचीन कूप के जल से अपनी प्यास शांत की थी। प्रभु श्री श्याम के चरणकमलों की धूलि से सिंचित होने के कारण ही मेरा नामकरण पहले ‘श्यामली’ और कालांतर में शामली हुआ। इसके अतिरिक्त महाभारत काल में कौरवों और पांडवों के मध्य संधि प्रयासों के दौरान भी इस क्षेत्र की ऐतिहासिक बाबरी का गुंबद का संदर्भ मिलता है।

शहर के बीच में प्रभु द्वारा मारुति नंदन की आराधना से प्रकट सिद्धपीठ हनुमान धाम आज संपूर्ण क्षेत्र की आस्था का संबल है। वर्तमान में हनुमान धाम के परिसर में द्वादश (12) ज्योतिर्लिंगों की अलौकिक स्थापना के साथ-साथ मनकामेश्वर महादेव का मंदिर श्रद्धालुओं को शिव-शक्ति की एकात्मता की अनुभूति करा रहा है। कैराना की ऐतिहासिक भूमि दानवीर कर्ण की तप स्थली के रूप में जानी जाती है। यहां का ऐतिहासिक कर्ण तालाब दानवीर के अमर त्याग तथा गंगापुत्र भीष्म व पांडवों के इस अंचल से जुड़ाव का मूक साक्षी है। मुगल सम्राट जहांगीर ने अपनी आत्मकथा ''तुजुक-ए-जहांगीरी'' में मेरे सुरम्य वातावरण, बागों और कैराना की मनभावन आबो-हवा की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।