शामली, जेएनएन। राष्ट्रीय किसान डिग्री कालेज में फसल अवशेष प्रबंधन जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इसमें कृषि विशेषज्ञों ने फसल अवशेष जलाने से पैदा होने वाली विभिन्न गंभीर बीमारियों व उनके समाधान की विस्तार से जानकारी दी।

सोमवार को राष्ट्रीय किसान डिग्री कालेज में फसल अवशेष प्रबंधन जागरूकता कार्यक्रम हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ कालेज के प्राचार्य डा. अरविद रस्तोगी द्वारा दीप प्रज्जवलित कर किया गया। कार्यक्रम का आयोजन डा. मांगेराम सैनी असिस्टेंट प्रोफेसर कीट विज्ञान विभाग द्वारा किया गया। कार्यक्रम में फसल अवशेष जलाने के कारण उत्पन्न होने वाली श्वांस व फेफड़ों संबंधी गंभीर बीमारियां, वायु एवं मृदा प्रदूषण के दुष्प्रभाव से निरंतर बढ रही चुनौतियां और उनके समाधान पर विस्तारपूर्वक जानकारी दी। कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिक डा. शीशपाल सिंह ने बताया कि फसल अवशेष जलाने के कारण दूषित हुए वातावरण का दुष्प्रभाव मनुष्यों व पशुओं के साथ-साथ मृदा स्वास्थ्य पर भी पडता है। मिट्टी में पाए जाने वाले मुख्य पोषक तत्व जैसे नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश आदि अन्य कार्बनिक पदार्थ नष्ट हो जाते हैं और उर्वरा शक्ति भी घटती है। कृषि विशेषज्ञ डा. ओमकार सिंह ने मृदा ताप बढने से होने वाले भौतिक एवं रासायनिक गुणों में परिवर्तन का जल धारण एवं वायु संचरण क्षमता के प्रतिकूल प्रभाव पर विस्तारपूर्वक जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यदि फसल अवशेषों के सा 20-25 किग्रा. प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन मिलाकर जुताई की जाए तो ये अवशेष मिट्टी में सड़कर पोषक तत्वों में बदल जाते हैं। डा. मागेराम सैनी ने कहा कि फसल अवशेष जलने से पारिस्थितिक तंत्र के घटक प्रभावित हो रहे हैं। पर्यावरण में उपस्थित विभिन्न मित्र जीव, सूक्ष्म जीव, परजीवी व परभक्षी जैसे प्राकृतिक शत्रुओं की संख्या निरंतर घटती जा रही है जिससे कीट व्याधियों के प्राकृतिक नियंत्रण का संतुलन बिगड़ रहा है। इस अवसर पर डा. सौरभ पांडे, महिपाल सिंह, अमित कुमार शर्मा, शिवम कौशिक, मनीष आदि भी मौजूद रहे।

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