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 22 करोड़ की ठगी मामला: सॉफ्टवेयर से बुना भ्रम जाल, तेजी से बढ़ता दिखता निवेश का पैसा

By S.K. SinghEdited By: Vivek Shukla
Published: Sat, 23 May 2026 08:23 AM (IST)

संतकबीर नगर में शेयर मार्केट में मोटा मुनाफा दिलाने के नाम पर 22 करोड़ रुपये की ठगी का खुलासा हुआ ...और पढ़ें

बाएं से रजनी प्रजापति व धनंजय शुक्ला। जागरण

बाएं से रजनी प्रजापति व धनंजय शुक्ला। जागरण

HighLights

  1. शेयर मार्केट में 22 करोड़ की ठगी का खुलासा।

  2. फर्जी वेबसाइट और ऐप से दिखाया जाता था वर्चुअल मुनाफा।

  3. मास्टरमाइंड दंपती ने 250 से अधिक लोगों को बनाया शिकार।

एसके सिंह, संतकबीर नगर। शेयर मार्केट में मोटा मुनाफा दिलाने का झांसा देकर 22 करोड़ ठगने वाले गिरोह का तरीका ऐसा था कि जो भी झांसे में आता खुशी-खुशी लुटता जाता। मास्टरमाइंड दंपती ने ट्रेडिंग व निवेश के लिए वेबसाइट और एप बनवाए थे। इसके साफ्टवेयर के डेटा बेस में निवेशकों को हर दिन उनका धन तेजी से बढ़ता दिखाया जाता था।

यही वर्चुअल मुनाफा देखकर लोग भरोसा करते गए और ठगी के जाल में फंसते चले गए। तीन वर्षों में 250 से अधिक लोगों को शिकार बनाने वाले इस गिरोह ने लोगों को फांसने के लिए लखनऊ, गोरखपुर और संतकबीर नगर में कार्यालय भी खोल रखे थे। ठगी का कारोबार चलाने वाले कुशीनगर के धनंजय शुक्ल और उसकी पत्नी रजनी प्रजापति ने सबसे पहले टीवीएस साल्यूशन के नाम से फर्म बनाई।

जीएसटी पंजीकरण कराया और उसी नाम से वेबसाइट बनवाई। इसके साथ ही एआइआइपीएल एप बनाया और उसे वेबसाइट से लिंक किया था। लिंक से एप खोलने पर यह शेयर मार्केट की तरह दिखता था। फर्क सिर्फ इतना था कि यहां डीमैट अकाउंट की कोई जरूरत नहीं थी। निवेशकों से यूपीआइ या बैंक ट्रांसफर के जरिये अलग-अलग खातों में रकम जमा कराई जाती थी।

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एप में न्यूनतम 180 दिन के लिए निवेश कराया जाता था और जमा रकम एपीआइ (एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) के जरिये निवेशकों के वालेट में बैलेंस के रूप में दिखाई जाती थी। एप में दिखाई देने वाला बैलेंस असली नहीं, बल्कि सिर्फ एप के डेटाबेस में दर्ज एक आंकड़ा था। ठग समय-समय पर रिटर्न आफ इंटरेस्ट बढ़ाकर लोगों को अधिक निवेश के लिए उकसाते रहते थे।

बड़ी रकम निवेश कराने के लिए शुरुआती एक-दो महीने तक लाभ भी दिया जाता था। छोटी रकम की निकासी आसानी से कर दी जाती थी, ताकि भरोसा बना रहे। लेकिन, जैसे ही बड़ी रकम जमा हो जाती थी, निकासी पर एरर, केवाईसी या तकनीकी दिक्कतों का बहाना बना भुगतान रोक दिया जाता था।