नेपाल में जलप्रलय से दो दिन पहले ही केरांग से शुरू हो गया था भूस्खलन, पहाड़ों से गिर रहे थे पत्थर
नेपाल में 26 अगस्त को आई जलप्रलय से दो दिन पहले ही भूस्खलन और रास्ते बंद होने जैसे तबाही के संकेत दिखने लगे थे।
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नेपाल में जलप्रलय से दो दिन पहले ही केरांग से शुरू हो गया था भूस्खलन।

समय कम है?
जानिए मुख्य बातें और खबर का सार एक नजर में
एसके सिंह, संतकबीरनगर। नेपाल में 26 अगस्त को आई जलप्रलय की भयावहता से दो दिन पहले ही पहाड़ खतरे का संकेत देने लगे थे। चीन सीमा पर केरांग से लेकर त्रिशूली नदी और उसके पार नेपाल के रसुआ तक जगह-जगह भूस्खलन होने लगा था। पहाड़ से पत्थर खिसक रहे थे और रास्ते बंद हो रहे थे।
स्थानीय प्रशासन और पुलिस पर्यटकों को आगे बढ़ने से रोकने के साथ सुरक्षित स्थानों की ओर लौटने की सलाह दे रही थी। कई जगह रास्ता बंद मिला तो यात्रियों को पैदल ही आगे बढ़ना पड़ा। जान बचाने की चिंता ऐसी थी कि शरीर की थकान भी पीछे छूट गई थी।
यह कहानी किसी एक यात्री की नहीं, बल्कि उन हजारों पर्यटकों की है जो 24 अगस्त को रसुआ की ओर बढ़ रहे थे। रास्ते की मुश्किलों के बावजूद यात्रियों की भीड़ रसुआ पहुंच रही थी। वहां काठमांडू लौटने के लिए बसों में सीट पाने को मारामारी मची थी। किसी को अंदाजा नहीं था कि जिन पहाड़ों के बीच से वे गुजर रहे हैं, दो दिन बाद वही इलाका जलप्रलय की चपेट में होगा।
कैलाश मानसरोवर यात्रा पूरी कर लौटे खलीलाबाद के बनियाबारी निवासी कथावाचक विद्याधर भारद्वाज और उनके तीन साथियों ने भी यह भयावह सफर देखा।
25 अगस्त को भारत लौटने के एक दिन बाद जब नेपाल में जलप्रलय की तस्वीरें सामने आईं तो चारों हैरत में पड़ गए। कुछ दिन और नेपाल में रुकने की उनकी योजना थी, लेकिन लगातार मिल रहे खतरे के संकेतों ने यात्रा सीमित कर उन्हें लौटने पर मजबूर कर दिया। अब वे इसे भगवान का आशीर्वाद मानते हैं।

पांच किमी पैदल, फिर 35 किमी बस से पहुंचे रसुआ
विद्याधर भारद्वाज ने बताया कि वे तीन साथियों के साथ नौ अगस्त की सुबह कार से निकले थे। उसी रात करीब 11 बजे काठमांडू पहुंचे। अगले दिन पशुपतिनाथ मंदिर में दर्शन-पूजन के बाद कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकल गए। 17 अगस्त को कैलाश मानसरोवर में दर्शन-पूजन और परिक्रमा की।
21 अगस्त से वापसी शुरू की और भ्रमण करते हुए 24 अगस्त को केरांग पहुंचे। आगे बढ़ने पर रास्ते की स्थिति लगातार बिगड़ती गई। जगह-जगह पत्थर खिसक रहे थे। रास्ते बंद मिलने पर करीब पांच किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। इसके बाद करीब 35 किलोमीटर बस से सफर कर रसुआ पहुंचे। रास्ते में पुलिस और स्थानीय प्रशासन यात्रियों को लगातार सावधान कर रहे थे।

आस्था के रास्ते पर खतरे ने रोक दिए कदम
कथावाचक के अनुसार वे लोग कुछ दिन और नेपाल में रुकना चाहता था। धार्मिक स्थलों के साथ प्राकृतिक सौंदर्य देखने की योजना थी, लेकिन पहाड़ों के बदलते मिजाज ने सब बदल दिया। गाइड की सलाह और प्रशासन की चेतावनी को देखते हुए उन्होंने वापसी का फैसला किया।
धार्मिक यात्रा अधूरी छोड़ने का मलाल था, लेकिन सुरक्षित लौटना ज्यादा जरूरी था। 25 अगस्त को सीमा पार कर भारत में प्रवेश किया और राहत की सांस ली। अगले ही दिन नेपाल में जलप्रलय की तस्वीरें सामने आईं। पहाड़ों से उतरता पानी और मलबा, क्षतिग्रस्त रास्ते और तबाह होते इलाकों को देखकर उनकी आंखें भर आईं।
