नियारा की राख में सोना तलाशने का खेल, अब तालाब पाटकर गांवों में फैला रहे ‘जहरीला कारोबार’
संतकबीरनगर के बखिरा में नियारा राख से सोना निकालने का कारोबार नेपाल से महाराष्ट्र तक फैला है, जो हजारों को ...और पढ़ें

एक दर्जन गांवों में पांच दशक से चल रहा पुश्तैनी कारोबार। जागरण
HighLights
नियारा राख से सोना निकालने का कारोबार व्यापक।
तालाबों को पाटकर, पर्यावरण प्रदूषित कर रहा है।
भूजल और स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर।
एसके सिंह, संतकबीरनगर। बखिरा में नियारा का कारोबार अब केवल गांव की गलियों तक सीमित नहीं है। नेपाल से लेकर यूपी, बिहार, महाराष्ट्र और गुजरात तक इसका नेटवर्क फैला है। दूसरे राज्यों के व्यापारी यहां नियारा की राख लेकर आते हैं और स्थानीय स्तर पर मजदूरों से इसकी धुलाई, छनाई और प्रसंस्करण का कार्य कराते हैं।
बहरहाल, सोना-चांदी व अन्य कीमती धातुओं की तलाश में चल रहा यह कारोबार हजारों लोगों को रोजगार तो दे रहा है, लेकिन इससे पड़ने वाले दुष्प्रभावों को लेकर प्रशासन की निद्रा अब तक नहीं टूटी है।
बखिरा और आसपास के लेडुआ महुआ, अमरडोभा, तरकुलवा, हारापट्टी, झुंगिया, छोटा गौरा और बड़ा गौरा समेत करीब एक दर्जन गांवों में यह कारोबार फैला हुआ है। स्थानीय लोगों के अनुसार नियारा का कारोबार पांच दशक से भी अधिक पुराना है।
लेडुआ पावर हाउस के पीछे स्थित बड़े तालाब में लंबे समय तक 40 से 50 कारीगर रोजाना राख की धुलाई करते थे। राख जमा होने से तालाब का बड़ा हिस्सा पट गया और उसकी जलधारण क्षमता प्रभावित हुई। इसके बाद गांव के दूसरे तालाब में भी धुलाई शुरू हुई।
करीब पांच वर्ष पहले इसको लेकर हो-हल्ला शुरू हुआ तो अधिकांश कारोबारी निजी भूमि पर यह काम करने लगे। झुंगिया के राकेश कहते हैं कि अब अधिकांश कारोबारी अपनी जमीन में पानी का टैंक बनाकर राख की धुलाई कर रहे हैं तथा प्रसंस्करण के बाद अवशेष जमीन में डंप कर रहे हैं। बारिश के दौरान इसका असर भी सामने आता है।
ठेके पर 2500 रुपये टन में होती है राख की धुलाई-सफाई
दूसरे राज्यों से व्यापारी नियारा की राख यहां लाकर अलग-अलग स्थानों पर डंप करते हैं। जमीन मालिकों को इसके लिए पांच सौ रुपये प्रतिदिन के हिसाब से किराया दिए जाने की बात भी सामने आई है। राख की धुलाई और सफाई का काम ठेके पर भी कराया जाता है। इसके लिए 2500 रुपये प्रति टन के हिसाब से मजदूरी देनी पड़ती है। इससे बड़ी संख्या में परिवारों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिल रहा है।

महाराष्ट्र और गुजरात की रिफाइनरी में कराया जाता है शोधन
पहले राख की पानी में धुलाई और छनाई की जाती है। बची सामग्री को सुखाकर मशीन से बारीक किया जाता है। इसके बाद भट्ठी में डालकर रासायनिक प्रक्रिया के जरिए सोना, चांदी और अन्य धातुओं को अलग करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। स्थानीय स्तर पर रिफाइनरी सुविधा नहीं होने के कारण बचा अवशेष बड़े व्यापारी गुजरात और महाराष्ट्र समेत अन्य राज्यों में ले जाते हैं, जहां धातु शोधन का कार्य होता है।
तमाम स्थानीय कारोबारियों ने धातु शोधन के लिए कई गांवों में विशेष प्रकार की भट्ठियां बनाई हैं। इसके जरिए कीमती धातुओं को राख से अलग किया जाता है। हालांकि, इसके धुएं से आसपास का वातावरण विषाक्त होने का खतरा है।
पेयजल जांच को लेकर इनके दावे अलग-अलग
जलनिगम ग्रामीण के अधिशासी अभियंता महेंद्र राम का कहना है कि बखिरा के आसपास के गांवों के भूगर्भ जल के प्रदूषित होने की जानकारी उनके पास नहीं है। हालांकि, टोटी से घरों में पहुंचने वाला पानी जांच में मानक के अनुरूप पाया गया है। वहीं, जलनिगम नगरीय के अधिशासी अभियंता सुदेश कुमार ने बताया कि बखिरा नगर पंचायत क्षेत्र में जलनिगम की कोई योजना संचालित नहीं है। नगर पंचायत को स्वयं पेयजल की जांच करानी चाहिए।
दूसरी ओर, केमिस्ट अर्पण के अनुसार लेडुआ महुआ, अमरडोभा, तरकुलवा, हारापट्टी, झुंगिया, छोटा गौरा और बड़ा गौरा समेत आसपास के गांवों में नल और अन्य पेयजल स्रोतों की जांच फील्ड टेस्ट किट से कराई जाती है। इसके लिए गांव की पांच महिलाओं को प्रशिक्षित किया गया है। हालांकि, उनके पास जांच की रिपोर्ट उपलब्ध नहीं है।
रोजगार जरूरी, लेकिन निगरानी भी महत्वपूर्ण
कारोबारियों के संगठित होने से अब इस मामले में खुलकर कोई बोलने को तैयार नहीं है। प्रभावित गांवों में लोगों का कहना है कि नियारा का कारोबार स्थानीय अर्थव्यवस्था में रोजगार का जरिया बना हुआ है। लेकिन तालाबों के पटने, खुले में राख के ढेर, भट्ठियों से निकलने वाले धुएं और रासायनिक अपशिष्ट के निस्तारण जैसे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रोजगार के इस स्रोत को बनाए रखते हुए पर्यावरण, जलस्रोत और लोगों की सेहत की सुरक्षा के लिए कारोबार की प्रभावी निगरानी और वैज्ञानिक जांच जरूरी है।
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बखिरा स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की ओपीडी में प्रतिदिन 80-100 मरीज आते हैं। इसमें से 40 प्रतिशत जलजनित बीमारियों से ग्रसित होते हैं। स्किन डिजीज में खुजली, चकत्ता के अलावा खांसी, दमा और पेटदर्द के भी रोगी काफी आते हैं। ऐसे रोगियों को पानी को गर्म कर उपयोग में लाने की सलाह दी जाती है। -डा. सबा नुसरत, प्रभारी चिकित्साधिकारी
नियारा की भट्ठी से निकलने वाले जहरीले धुएं से हवा दूषित हो जाती है। सोना-चांदी गलाने में तेजाब का इस्तेमाल किया जाता है। इसके संपर्क में आने से निमोनिया हो सकता है, जो काफी खतरनाक होता है। इससे फेफड़ों को काफी क्षति पहुंचती है। -डा. एमएम सिंह, पूर्व सीएमओ, सिद्धार्थनगर
भूमि में पोषक तत्वों की जांच कराई जाती है। लेकिन प्रत्येक न्याय पंचायत में यह कार्य तीन साल में एक बार होता है। बखिरा के आसपास के इलाकों की भूमि की जांच हुई है या नहीं, इसकी जानकारी नहीं है। -डा. राकेश कुमार सिंह, उप कृषि निदेशक
