सिरसी: यहां की शिया जामा मस्जिद 656 साल पुरानी है। मस्जिद के ठीक सामने मरकजी इमाम बारगाह व सिरसी के संस्थापक हजरत जमालुद्दीन उर्फ दादा मखदूम साहब का मजार है। तीनों ऐतिहासिक इमारतें आसपास हैं। यहां अकीदतमंद रोजाना बड़ी तादात में मुरादे मांगने व इबादत करने आते हैं। इमाम बारगाह व मजार पर बिना जाति, धर्म, मजहब के सभी सम्प्रदाय के लोग आते हैं।

इतिहास के जानकार नवाजिश नकवी का कहना है कि शिया जामा मस्जिद 764 हिजरी 1363 ईस्वी में तामीर हुई। इसका तारीखी नाम खाना ए हक है। इसे बड़ी मस्जिद भी कहा जाता है। मस्जिद काफी ऊंचाई पर बनी हुई है। पहले मस्जिद में काफी बड़ा हौज भी था। साथ ही मस्जिद के साथ कुआं भी था। शिया समुदाय में जुमे की नमाज एकमात्र इसी मस्जिद में पढ़ी जाती है। इसीलिए इसे जामा मस्जिद कहा जाता है सिरसी की आबादी बढ़ने के साथ यहां नमाजियों की तादात भी बढ़ने लगी तो मस्जिद का हौज बंद कराकर वहां फर्श करा दिया गया। इस मस्जिद में मिलक सिरसी व महमूदपुर माफी से भी लोग जुमे की नमाज पढ़ने आते हैं। मस्जिद के गेट को मुतवल्ली चौ. उरूज आलम द्वारा नया रूप दे दिया गया है, लेकिन मस्जिद के गुम्बद अभी भी इसके प्राचीन होने की गवाही दे रहे हैं। नमाजियों की सुविधाओं को बढ़ाने के लिये मुतवल्ली द्वारा प्रयास किये जा रहे हैं। मस्जिद में पंखे, कूलर व सबर्मिसबल कराया गया है, ताकि नमाजियों को वजू के लिये पानी की कमी न हो। साथ ही मस्जिद के सामने लगने वाले सब्जी बाजार की आमदनी भी मस्जिद के संचालन में काम आती है।

नमाजियों द्वारा भी अपने मरहूम बुजुर्गों के सवाब (पुण्य) के लिये भी मस्जिद में कार्य कराये जाते रहते हैं। मस्जिद के ठीक सामने प्राचीन मरकजी इमाम बारगाह है। नवाजिश नकवी के अनुसार इसकी तामीर दादा मखदूम के नवासे सय्यद हसन आरिफ नकवी ने 734 हिजरी 1333 ईसवी में कराई थी। यह सिरसी का पहला इमाम बारगाह है। इसका तारीखी नाम अ•ाखाना है। इमाम बारगाह में शहीदे कर्बला की याद में अजादारी का सिलसिला चलता रहता है। इस इमाम बारगाह से अजादारी के अनेक तारीखी जुलूस निकाले जाते हैं, जिनमे हजारों लोग शामिल होते हैं। इसका दरवाजा इतना बड़ा है कि अजादारी के जुलूसों में शामिल ऊंट भी आसानी से अंदर चले जाते हैं। इमाम बारगाह से लगा दादा मखदूम साहब का मजार है। कहा जाता है कि सिरसी की स्थापना इन्ही बुजुर्ग ने की थी, इनकी करामात जग जाहिर है। दादा मखदूम साहब का अहाता काफी वसी रकबे में है इसमें जमीन कच्ची होने के कारण बिच्छू पाए जाते हैं। खुदा की कुदरत और दादा मियां की बरकत से अहाते के अंदर कभी किसी को नहीं काटते। बल्कि हाथ पर लेने पर डंक समेट लेते हैं। सिरसी में सादात मुस्लिम समुदाय में शादी होने पर दूल्हा बारात लेकर जाने से पहले इमाम बारगाह में हाजिरी देकर दादा मियां के मजार पर आशीर्वाद लेने आता है, उसके बाद ही दुल्हन के घर बारात जाती है। दादा मियां के मजार पर हर साल क्षेत्र का प्रसिद्ध हुजूम का मेला लगता है। इमाम बारगाह व मजार तीनो के मुतवल्ली चौ. सय्यद उरूज आलम नकवी है, जो इनका प्रबंध देखते हैं।

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Posted By: Jagran

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