गांव की बेटियों को मुफ़्त 'उड़ान' दे रहीं ये दो महिलाएं, विलुप्त होती लोककला और नृत्य को ऐसे बचा रहीं जीवंत
संभल में डॉ. दीपा सिंह ग्रामीण बेटियों को निःशुल्क नृत्य प्रशिक्षण देकर उनके सपनों को साकार कर रही हैं। वहीं, ...और पढ़ें

माया देवी महाविद्यालय में छात्राओं को नृत्य प्रशिक्षण देतीं डा. दीपा सिंह और बेटियों के साथ चंडोल नृत्य करतीं ममता राजपूत
HighLights
1999 में हासिल की प्रभाकर की उपाधि, 10 वर्ष से महाविद्यालय में दे रहीं प्रशिक्षण
ग्रामीण क्षेत्र की 20 छात्राओं को अपने घर निश्शुल्क सिखा रहीं नृत्य की बारीकियां
संवाद सहयोगी, संभल। प्रतिभा किसी शहर की मोहताज नहीं होती, बस उसे निखारने के लिए सही मार्गदर्शन की जरूरत होती है। असमोली के गांव भैंसोडा निवासी डाॅ. दीपा सिंह इसी सोच के साथ ग्रामीण क्षेत्र की बेटियों को नृत्य की बारीकियां सिखा रही हैं। वह वर्तमान में घर पर करीब 20 छात्राओं को निश्शुल्क नृत्य का प्रशिक्षण दे रही हैं।
वहीं, पिछले 10 वर्षों से भैंसोडा स्थित माया देवी महाविद्यालय में छात्राओं को नृत्य नाटिका का प्रशिक्षण दे रही हैं। दीपा सिंह ने वर्ष 1999 में प्रयाग संगीत समिति, इलाहाबाद से संबद्ध मुरादाबाद के श्रीकृष्णा संगीत महाविद्यालय से गायन, वादन और नृत्य में पांच वर्षीय प्रभाकर की डिग्री हासिल की।
संगीत और नृत्य की विधिवत शिक्षा लेने के बाद उन्होंने इसे अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। वह छात्राओं को नृत्य के साथ भाव-भंगिमा, ताल, मुद्राओं और मंच पर प्रस्तुति देने का प्रशिक्षण देती हैं। विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए छात्राओं को नृत्य नाटिकाएं भी तैयार कराती हैं।
निश्शुल्क प्रशिक्षण लेने वाली छात्राओं में कई ऐसी हैं, जिन्हें आर्थिक कारणों से बाहर जाकर प्रशिक्षण लेना संभव नहीं है। डाॅ. दीपा सिंह का कहना है कि नृत्य केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है। ग्रामीण क्षेत्र की बेटियों में प्रतिभा की कमी नहीं है। उन्हें अवसर और मार्गदर्शन मिले तो वह किसी भी मंच पर अपनी पहचान बना सकती हैं।
चंडोल नृत्य को विलुप्त होने से बचा रहीं ममता राजपूत
गुन्नौर : प्राचीन चंडोल नृत्य कला को विलुप्त होने से बचाने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का बीड़ा उड़ान आर्टिस्ट ग्रुप ने उठाया है। संस्था की लोक कला संयोजक (मेरठ प्रांत) ममता राजपूत के प्रयासों से चंडोल नृत्य को संस्कृति विभाग के लोक एवं जनजातीय कला अनुभाग में पंजीकृत कराया गया है।
इसके बाद दिल्ली, लखनऊ, प्रयागराज और मुरादाबाद समेत कई बड़े मंचों पर इसका प्रदर्शन हो चुका है। चंडोल नृत्य शुभ विवाह से जुड़ी प्राचीन लोक परंपरा है। विवाह से पहले माता नोतिया की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर आठ दिनों तक पूजा होती है।
अंतिम दिन चंडोल यात्रा निकाली जाती है, जिसमें कद्दू के फूल का विशेष महत्व होता है। महिलाएं, युवतियां और पुरुष भजन-कीर्तन करते हुए सिर पर चंडोल रखकर गांव में शोभायात्रा निकालते हैं।
ममता राजपूत ने बताया कि बबराला में बालिकाओं और युवतियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ग्रुप से 400-500 कलाकार जुड़े हैं। उनका कहना है कि लोककला बचाना अपनी सांस्कृतिक पहचान और विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है।
