संभल से दिल्ली के करोल बाग तक फैला है मोबाइल चोरी का नेटवर्क, खरीदारों की तलाश में जुटी पुलिस
मोबाइल चोरी करने वाले गिरोह के पकड़े जाने के बाद पुलिस अब चोरी के मोबाइलों के खरीदारों की तलाश में ...और पढ़ें

करोल बाग तक चोरी के मोबाइलों का नेटवर्क।
HighLights
पुलिस चोरी के मोबाइलों के खरीदारों की तलाश में जुटी।
संभल से चोरी हुए मोबाइल दिल्ली के करोल बाग पहुंचते थे।
IMEI बदलने और पुर्जे खपाने की आशंका पर भी जांच।
संवाद सहयोगी, बहजोई। गुन्नौर में मोबाइल चोरी करने वाले गिरोह के पकड़े जाने के बाद पुलिस की जांच अब चोरी के मोबाइलों के खरीदारों तक पहुंचने पर केंद्रित हो गई है। पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि संभल से चोरी किए गए मोबाइल दिल्ली के करोल बाग तक कैसे पहुंचते थे और वहां उन्हें खरीदने वाले कौन लोग हैं।
मोबाइलों को सीधे बेचने के साथ ही उनके पुर्जे निकालकर खपाने या आईएमईआई नंबर बदलकर दोबारा बाजार में उतारने की आशंका भी जांच के दायरे में है।
10 अक्टूबर को पकड़े गए गिरोह के चार आरोपितों के पास से पुलिस ने 42 एंड्रायड मोबाइल बरामद किए थे। इनकी कीमत करीब 10 लाख रुपये बताई गई है। पुलिस के अनुसार, गिरोह ने करीब 500 मोबाइल चोरी किए हैं।
अब जांच का अहम पहलू यह पता लगाना है कि चोरी के इन मोबाइलों को खरीदने वाले लोग कौन थे और उन्हें आगे कहां बेचा जाता था। गिरफ्तार आरोपितों की पहचान झारखंड के साहेबगंज जिले के तालझाड़ी थाना क्षेत्र के महाराजपुर, नया टोला कल्याणी निवासी दिनेश कुमार मेहतो, सुरंजन कुमार शाह और करन कुमार के रूप में हुई है।
दिनेश और करन अलीगढ़ के पाठकपुर स्थित विष्णुपुरी में रह रहे थे, जबकि सुरंजन अलीगढ़ की नई बस्ती, मसूदाबाद में रहता था। गिरोह के पकड़े जाने के बाद अब पुलिस को चोरी के मोबाइलों की खरीद-फरोख्त में शामिल लोगों की तलाश है।
करोल बाग में मोबाइलों के खरीदारों से लेकर उन्हें आगे बेचने वालों तक की कड़ियां जोड़ना जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा है। पुलिस यह भी पता लगाएगी कि मोबाइल चोरी करने के बाद उन्हें उसी हालत में बेचा जाता था या उनके पुर्जे अलग करके दूसरे फोन में इस्तेमाल किए जाते थे।
एसपी विकास चंद्र त्रिपाठी ने बताया कि शुरुआती जांच में चोरी के मोबाइल खरीदने वालों की पहचान स्पष्ट नहीं हो सकी है। पुलिस पूरे प्रकरण की जांच कर रही है। जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके आधार पर कार्रवाई की जाएगी।
पुलिस के सामने पांच बड़े सवाल
- खरीदार कौन हैं? चोरी के मोबाइल खरीदने वाले लोगों की पहचान क्या है और दिल्ली के करोल बाग में उनका नेटवर्क कहां तक फैला है?
- पूरे मोबाइल बिकते थे या पुर्जे? चोरी के मोबाइल सीधे बेचे जाते थे या उनके पुर्जे निकालकर दूसरे मोबाइलों में इस्तेमाल किए जाते थे?
- बदले जाते थे आइएमईआइ नंबर? क्या मोबाइलों के आइएमईआइ नंबर बदलकर उनकी पहचान छिपाई जाती थी या सुरक्षा लॉक तोड़कर उन्हें दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाया जाता था?
- मांग पर होती थी चोरी? क्या गिरोह को पहले से मोबाइलों की मांग मिलती थी और उसी के अनुसार चोरी की घटनाओं को अंजाम दिया जाता था?
- कितने जिलों तक फैला नेटवर्क? संभल के अलावा किन जिलों में गिरोह की गतिविधियों के साक्ष्य मिले हैं और क्या मोबाइल खरीदने-बेचने वाले अन्य लोग भी इसमें शामिल हैं?
