शायरी का एक 'बद्र' डूबा: जब 1987 के मेरठ दंगों के बीच संभल के इस घर में आकर रुके थे मशहूर शायर, दोस्त की जुबानी अनसुनी यादें
मशहूर शायर बशीर बद्र का संभल से गहरा नाता रहा है, जहां वे मुशायरों में शामिल हुए और 1987 के ...और पढ़ें

संभल में वर्ष 1982 में शायर रिजवान मसरूर की पुस्तक के विमोचन पर कलाम पढ़ते बशीर। सौ. रिजवान मसरूर
HighLights
1973 में पहली बार पहुंचे थे संभल, फिर कई बार मुशायरों में हुए शामिल, समर्थक और परिचितों में दौड़ा शोक
जागरण संवाददाता, संभल। मशहूर शायर डाॅ. बशीर बद्र का संभल से गहरा नाता रहा है। इसलिए वह यहां पर न सिर्फ मुशायरों में शामिल हुए बल्कि एक बार बुरे वक्त में भी उन्होंने संभल में ही पनाह ली है। अब उनके निधन की जानकारी मिलने के बाद शहर के रहने वाले समर्थक और परिचितों में शोक की लहर दौड़ गई है। उनसे जुड़ाव और शायरी पसंद करने वाले उनकी चर्चा कर रहे हैं।
बताया गया है कि वह संभल में चार बार आए हैं। तीन बार मुशायरों में शामिल हुए और चौथी बार मेरठ में हुए दंगे से बचकर यहां पर रुके थे। शहर के दीपा सराय निवासी शायर रिजवान मसरूर ने दावा किया है कि मशहूर शायर बशीर बद्र से उनका बेहद जुड़ाव था। इसलिए उनके बारे में घर तक की जानकारी है।
उन्होंने बताया कि बशीर बद्र चार बार संभल आए थे। पहली बार 26 फरवरी 1973 को हाजी अहमद हुसैन के प्रतिष्ठान पर आयोजित मुशायरे में शामिल हुए थे। दूसरी बार में 1978 में कल्लू हाफिज के खेत में आयोजित हुए मुशायरे में शामिल हुए थे। तब, उनके साथ शायर दिलीप कुमार, ओमप्रकाश और जानी वाकर भी मुख्य अतिथि थे।
फिर तीसरी बार 29 अप्रैल 1982 को संभल के शायर रिजवान मसरूर की किताब सुलगते खंडहर के विमोचन कार्यक्रम में पहुंचे थे। आखिर में चौथी बार उनका आगमन 1987 में जब हुआ था, जब मेरठ में दंगा फैला हुआ था। उस समय पर उनके साथ पंजाब के शायर वेदकुमार दिवाकर भी थे।
कहीं से मुशायरा कर लौट रहे थे, तब मेरठ में दंगे की बात चलने पर कई दिन संभल में ही स्थानीय शायर रिजवान मसरूर के घर पर रुके थे। क्योंकि मेरठ के दंगे में कर्फ्यू लगा था। रिजवान मसरूर कहते हैं कि बशीर बद्र बेबाक शायर थे और मेरठ कालेज में प्रवक्ता थे। वह मेरठ से ही भोपाल जाकर बसे थे। उन्होंने बताया कि बद्र साहब बहुत मिलनसार व्यक्ति थे। उनका इस दुनिया से जाना उर्दू साहित्य का बहुत बडा नुकसान है।
