विज्ञापन हटाएंसिर्फ खबर पढ़ें

ओवैसी की चुनौती से चढ़ा सियासी पारा: संभल में AIMIM की एंट्री से क्या बदलेगा सपा का सियासी गणित?

Published: Tue, 13 Oct 2026 07:12 AM (IST)

असदुद्दीन ओवैसी की चुनौती ने संभल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है, जिससे 2027 विधानसभा चुनाव से पहले ...और पढ़ें

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी।

एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी।

HighLights

  1. ओवैसी ने योगी-अखिलेश को संभल-गोरखपुर से लड़ने की चुनौती दी।

  2. संभल में AIMIM की बढ़ती सक्रियता सपा के लिए चुनौती बनी।

  3. मुस्लिम वोटों का बंटवारा 2027 चुनाव में अहम भूमिका निभाएगा।

सौरव प्रजापति, संभल। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले संभल की सियासत में एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी की चुनौती ने नई बहस छेड़ दी है। आजमगढ़ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को संभल और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव को गोरखपुर से चुनाव लड़ने की चुनौती देकर ओवैसी ने संभल को प्रदेश की चुनावी चर्चा के केंद्र में ला दिया। उनके बयान को संभल में एआईएमआईएम की मौजूदगी और चुनावी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।

सात बार विधानसभा पहुंच चुके हैं इकबाल महमूद

संभल विधानसभा सीट लंबे समय से समाजवादी पार्टी का मजबूत आधार रही है। यहां के विधायक इकबाल महमूद सात बार विधानसभा पहुंच चुके हैं। वर्ष 2022 के चुनाव में उन्होंने भाजपा प्रत्याशी राजेश सिंघल को हराया था। ऐसे में एआईएमआईएम की बढ़ती सक्रियता सपा के लिए चुनौती बन सकती है, हालांकि इसे सीधे चुनावी सफलता का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। जामा मस्जिद के सदर जफर अली के एआईएमआईएम में शामिल होने और चुनाव लड़ने की इच्छा जताने के बाद पार्टी की स्थानीय रणनीति पर नजर है।

योगी को संभल और अखिलेश को गोरखपुर से लड़ने की चुनौती देकर ओवैसी ने बढ़ाई हलचल

हिंसा के मामले में जेल जा चुके जफर अली टिकट के दावेदार बताए जा रहे हैं। वहीं, शकील अहमद की चुनावी महत्वाकांक्षा भी सामने आई है। ऐसे में प्रत्याशी चयन पार्टी के लिए अहम होगा। मुस्लिम मतदाताओं की महत्वपूर्ण भूमिका वाली इस सीट पर सपा और एआईएमआईएम के बीच प्रतिस्पर्धा मतों के बंटवारे का सवाल खड़ा करती है। एआईएमआईएम को पर्याप्त समर्थन मिलने पर मुकाबले के समीकरण बदल सकते हैं।

मुस्लिम मतों का समीकरण रहेगा अहम

चेयरमैन आसिया मुशीर भी इसी पार्टी से हैं। भाजपा की संभावनाओं पर इसका क्या असर होगा, यह प्रत्याशियों, स्थानीय मुद्दों और मतदाताओं के रुख पर निर्भर करेगा। 24 नवंबर 2024 को जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा के बाद संभल की राजनीति में कई मुद्दे उभरे। हिंसा में मारे गए लोगों के स्वजन से मुलाकात और उनकी पैरवी को लेकर सपा विधायक इकबाल महमूद तथा नगर पालिका अध्यक्ष आसिया के पति मुशीर खां के बीच बयानबाजी हुई। इसे प्रभावित परिवारों के बीच अपनी भूमिका और सक्रियता दिखाने की प्रतिस्पर्धा के रूप में भी देखा गया।

यह भी पढ़ें- अगर सच में अयोध्या से चुनाव लड़ जाएं CM योगी और अखिलेश यादव, तो कौन होगा भारी?

सपा के सामने अपना पुराना जनाधार और राजनीतिक संपर्क बनाए रखने की चुनौती

एआईएमआईएम के लिए ये मुद्दे स्थानीय पहचान मजबूत करने का अवसर हो सकते हैं, जबकि सपा के सामने अपना पुराना जनाधार और राजनीतिक संपर्क बनाए रखने की चुनौती है। बयानबाजी और सक्रियता चुनावी समर्थन में बदलेगी या नहीं, यह मतदाताओं की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा। फिलहाल ओवैसी की चुनौती ने 2027 के चुनाव से पहले संभल की सियासत में नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

क्या एआईएमआईएम अपनी सक्रियता को मजबूत संगठन और जनसमर्थन में बदल पाएगी? क्या इकबाल महमूद के सामने कोई प्रभावी चुनौती उभरेगी? और क्या भाजपा इस बदलती प्रतिस्पर्धा से अपने लिए अवसर तलाशेगी? इन सवालों के जवाब चुनाव के करीब आने पर अधिक स्पष्ट होंगे।