यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 21, 2017 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
इनके हाथ नहीं, हौसले में है जान
सौरभ सक्सेना, चन्दौसी मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होत

सौरभ सक्सेना, चन्दौसी
मंजिल उन्हीं को मिलती है जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है.. किसी शायर की ये लाइनें समरटोला निवासी नीतू पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं। हाथ से दिव्यांग नीतू ने अपने पिता का उस काम में हाथ बंटाया जिसमें पुरुषों का एकाधिकार समझा जाता था।
28 बसंत पार कर चुकीं नीतू के दाहिने हाथ ने 15 साल की उम्र में काम करना बंद कर दिया था। बकौल नीतू जब वह हाईस्कूल में थीं तो उसे तेज बुखार आया और उसने घर में रखी एक दवा खा ली। इसके बाद उसके दाहिने हाथ ने पूरी तरह और दाहिने पैर ने आंशिक रूप से काम करना बंद कर दिया। इसके बाद भी नीतू ने हिम्मत नहीं हारी। पिता कल्याण दास ने भी उसे प्रोत्साहित किया तो उसने पिता के खराद और वे¨ल्डग के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। शुरू में उसे हाथ की वजह से परेशानियों का सामना करना पड़ा, लेकिन अपने हौसले के बलबूते पर धीरे-धीरे वह वेल्डिंग और खराद के काम में पारंगत हो गई। शादी के बाद पति राघव भी उसका हाथ बंटाता है।
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बेटों से कम नहीं समझा बेटियों को
कल्याण दास का खराद और वे¨ल्डग का काम करते हैं। उनकी चार बेटियां हैं। उन्होंने बेटियों को कभी कम नहीं समझा। सबसे बड़ी बेटी रेनू ने एमए किया है। उसकी शादी बदायूं में हुई है। दूसरी बेटी नीतू है। तीसरी बेटी पूजा मेरठ से एमबीए कर रही है, जबकि चौथी मीनू बीए कर रही है। केवल नीतू ही हाथ की दिव्यांगता के चलते हाईस्कूल तक की शिक्षा ले पाई, लेकिन पिता के व्यवसाय में हाथ बंटाकर उसने खुद को साबित कर दिया कि बेटियां भी बेटों से कम नहीं होती हैं।
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दिव्यांग पति-पत्नी बने एक दूसरे का सहारा
नीतू का पति राघव भी एक पैर से दिव्यांग है। पोलियो के कारण उसका दाहिना पैर बेकार हो गया। सहारनपुर के गागलहेड़ी थाना क्षेत्र के गांव हरियाबाग निवासी राघव ने वर्ष 2011 में नीतू से शादी की और तब से ही यहीं रहकर उसका हाथ बंटा रहा है।
