सहारनपुर (जेएनएन)। वाराणसी में श्रीराम की आरती कर चर्चाओं में आईं मुस्लिम महिलाओं और देवबंदी उलमा के बीच बयानबाजी थमने का नाम नहीं ले रही है। देवबंदी उलमा ने राय जाहिर की थी कि आरती उतारने वाली महिलाएं ईमान से खारिज हो गईं हैं, उन्हें दोबारा इस्लाम में आने के लिए कलमा पढऩा पढ़ेगा। इसके बाद वाराणसी के कार्यक्रम में शामिल रही नाजनीन अंसारी ने दारुल उलूम पर मुकदमे की बात कही थी। रविवार को दारुल उलूम जकरिया के मोहतमिम मुफ्ती शरीफ कासमी ने कहा कि आरती करने वाली महिलाएं न केवल इस्लाम से खारिज हैं, बल्कि इस हालात में उनका निकाह भी खत्म हो जाता है। उन्हें तौबा कर इस्लाम में दाखिल होना होगा और दोबारा अपने शौहर से निकाह करना होगा। फतवा ऑन मोबाइल सर्विस के चेयरमैन मुफ्ती अरशद फारूकी ने कहा कि जब कोई इस्लाम मजहब से खारिज हो जाता है तो उसका निकाह भी टूट जाता है। उधर, दारुल उलूम के मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने कहा कि इस मसले पर दारुल उलूम की तरफ से कोई बयानबाजी नहीं हुई है। अगर फतवा विभाग से कोई कुछ पूछेगा तो जवाब तो दिया ही जाएगा। 

टीवी डिबेट में बयान देने से बचें उलमा 

दारुल उलूम ने बयान जारी कर उलमा से टीवी और न्यूज चैनल्स पर धार्मिक डिबेट में हिस्सा न लेने की अपील की है। ङ्क्षप्रट मीडिया में भी गैर जरूरी बयानबाजी और प्रतिक्रियाओं से बचने को कहा है। विश्व प्रसिद्ध इस्लामिक संस्था के मोहतमिम मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने कहा कि इसे मुद्दा बना लिया जाता है। इससे इस्लाम का गलत संदेश जाता है। नोमानी ने कहा कि अन्य मदरसों के उलमा के व्यक्तिगत बयानों से दारुल उलूम का कोई संबंध नहीं होता है। देवबंद में बहुत सारी संस्थाएं ऐसी चल रही हैं, जिनके नाम से पहले दारुल उलूम लिखा हुआ है। इसका मतलब यह नहीं कि वहां से जो बयान दिया जाए, उसे भी दारुल उलूम देवबंद से जोड़ दिया जाए। दूसरी ओर यूपी राबता कमेटी के महासचिव डा. मौलाना उबैद आसिम कासमी ने दारुल उलूम से मीडिया के लिए मजबूत पॉलिसी बनाने का आह्वान किया है। कहा कि बहुत सारे इस्लामिक मुद्दे ऐसे होते हैं जिन पर दारुल उलूम का बयान जाना जरूरी होता है। लेकिन कोई मीडिया सेल न होने के कारण संस्था में मीडियाकर्मी इधर उधर भटकते रहते हैं। जब उन्हें दारुल उलूम से कोई बयान नहीं मिल पाता है तो वे किसी अन्य उलमा के बयान को दारुल उलूम से जोड़ देते हैं। 

दोबारा कलमा पढऩे का सवाल ही नहीं : हाजी इकबाल

हवन में आहुति देते हुए सोशल मीडिया पर वायरल फोटो पर पूर्व एमएलसी हाजी मोहम्मद इकबाल का कहना है कि इस्लाम में नेक नीयत का होना सबसे जरूरी है। कहा कि वह कॉलेज के चेयरमैन के नाते कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस पर दोबारा कलमा पढऩे या न पढऩे का सवाल कहां से आता है। इस फोटो को लेकर दारुल उलूम के फतवा ऑनलाइन सर्विस के चेयरमैन मुफ्ती अरशद फारुखी ने कहा था कि यदि इस्लाम धर्म के व्यक्ति द्वारा दूसरे मजहबी अकीदे को अपनाते हुए धार्मिक क्रियाएं की जाती है तो वह इस्लाम से खारिज हो जाता है। यदि हाजी इकबाल ने ऐसा किया है तो उन्हें अल्लाह से तौबा कर दुबारा कलमा पढ़ ईमान में दाखिल होना चाहिए। इस पर हाजी मोहम्मद इकबाल ने कहा कि इस्लाम में हर काम नीयत से होता है, हज पर जाने के लिए भी नेक नीयत होती है, नमाज के समय भी और निकाह के समय भी नीयत होती है। कहा कि देश में करीब डेढ़ सौ आयुर्वेद कॉलेज हैं, उनमें करीब 30 कॉलेज मुस्लिमों के हैं, उन सभी जगह भी इस तरह के आयोजन हुए हैं। वह धन्वंतरि जयंती के अवसर पर हुए कार्यक्रम में भारत सरकार से जारी सर्कुलर के अनुपालन में शामिल हुए थे। 

 

Posted By: Nawal Mishra

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