सहारनपुर, जेएनएन। सहारनपुर गदर की माटी है। जनपद में कई ऐसे स्थान मौजूद हैं, जहां जंग-ए-आजादी के निशां बाकी हैं। खासकर पुलिस थानों की दीवारें अभी भी क्रांतिकारियों के संघर्ष, बलिदान, तथा अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म की दास्तां बयां कर रही है। जनपद के सैकड़ों वीर सपूतों को आजादी की लड़ाई के दौरान इन्हीं थानों में बंदकर अमानवीय यातनाएं दी गईं, 1930 में सरदार भगतसिंह की बम फैक्ट्री मोहल्ला चौक फरोशान से पकड़ी गई थी, जिसमें शहीद-ए-आजम सरदार भगत सिंह के साथी डा. गया प्रसाद, शिव वर्मा और जयदेव कपूर को अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ्तार किया था, जिसके बाद इन्हीं थानों की हवालातों में बंदकर इन पर जुल्म ढाए गए। बड़गांव सहारनपुर का सबसे पुराना थाना है। कभी देवबंद तक बड़गांव की पुलिस चौकी हुआ करती थी। इसलिए जिलेभर के क्रांतिकारी बड़गांव ले जाए जाते थे, यहीं काली घनी रातों में क्रांतिकारियों पर जुल्म की इंतहा बरपाई जाती थी।

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आजादी के मतवालों के जुनून की गवाही देते ब्रिटिश कालीन थानों पर रिपोर्ट सी 1- 1909 में बैठने लगा था अंग्रेजी कप्तान, देता था जुल्म ढाने के आदेश

सहारनपुर: आज जिस इमारत में एसपी देहात का दफ्तर है। वहां अंग्रेजी हुकूमत में सहारनपुर जनपद के एसपी का कार्यालय था। यहीं से क्रांतिकारियों पर जुल्म बरपाने का आदेश पुलिस को दिया जाता था। यह कार्यालय 1907 में निर्मित किया गया था। सहारनपुर पुलिसलाइन के भवन का निर्माण भी अंग्रेजी हुकूमत में 1864 में हुआ था। आंकिक कार्यालय द्वार पर लगा शिलापट इसका गवाह है। यानी कि 1868 से 1908 के बीच अंग्रेजी पुलिस यहां अपना डेरा जमा चुकी थी। हालांकि थाना बड़गांव व थाना गंगोह 1907 में ही वजूद में आ चुके थे। डकैतों का ज्यादा असर होने के कारण 1912 में थाना चिलकाना, बिहारीगढ़, कोतवाली नगर, थाना देहरादून, हरिद्वार और थाना रुड़की भी बनाए गए।

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अफसर यंग ने पकड़ा था सुल्ताना डाकू

उस दौर में अंग्रेजी हुकूमत के लिए डकैतों से पार पाना बड़ी चुनौती बन चुका था। डाकू सुल्ताना के खात्मे के लिए इंग्लैंड से अफसरों की यहां लगातार तैनाती हो रही थी। उन्हीं में से एक पुलिस अफसर थे मिस्टर यंग। यंग ने सहारनपुर में तैनाती के काल में बिजनौर जाकर डाकू सुल्ताना को पकड़ा था, जिसे आगरा जेल ले जाकर फांसी पर लटकाया गया था।

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अंग्रेजों के खिलाफ दारुल उलूम से बजा था बिगुल

सहारनपुर जिले पर सन 1803 में अंग्रेजों का आधिपत्य हुआ करता था। 1857 के बाद देवबंद ने ब्रिटिश हुकूमत का विरोध किया। देवबंद ने शाह वालिल्लाह के क्रांतिकारी विचारों का समर्थन किया था तथा मौलाना नानौतवी और मौलाना राशिद अहमद गंगोह ने 1867 में देवबंद में एक स्कूल की स्थापना की थी, जो बाद में दारूल उलूम के नाम से पहचाना जाने लगा। अंग्रेजों को भारत से बाहर करने के लिए दारूल उलूम की क्रांतिकारी गतिविधियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रसिद्ध क्रांतिकारी मौलाना महमूदुल हसन मदरसे के पहले छात्र थे।

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तब घोड़ों से गश्त करती थी अंग्रेजी पुलिस

संवाद सूत्र, छुटमलपुर : फतेहपुर भादो गांव का इतिहास करीब तीन सौ साल से भी ज्यादा पुराना है। इस गांव में ब्रिटिश शासनकाल की दो प्राचीन इमारतें आज भी मौजूद हैं। फतेहपुर भादों में देहरादून हाईवे पर सन 1890 में निर्मित लोक निर्माण विभाग का निरीक्षण गृह है। फतेहपुर थाने का निर्माण भी ब्रिटिश शासनकाल के दौरान सन 1922 में हुआ था। बताते हैं कि तब यहां चंद सिपाही ही तैनात हुआ करते थे, जो घोड़ों से गश्त करते थे। बिहारीगढ़ थाने की स्थापना भी अंग्रेजी हुकूमत ने वर्ष 1917 में कराई थी। थाने के सौ वर्ष पूरा होने पर वर्ष 2017 में शताब्दी समारोह भी आयोजित किया गया था।

Posted By: Jagran

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