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दुनिया-जहान में जिनका कोई नहीं, उनके 'वारिस' बन निभा रहे अंतिम संस्कार का जिम्मा... कोई नाम नहीं, सिर्फ काम

By Deepak Prajapati Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Sun, 27 Sep 2026 07:10 PM (IST)

सहारनपुर में राहुल झाम और उनकी 10 सदस्यीय टीम बेसहारा और लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर रही है। यह ...और पढ़ें

अपनी टीम के साथ लावारिस लोगों की अस्थियां लिए नुमाईशकैंप निवासी राहुल झाम। जागरण

अपनी टीम के साथ लावारिस लोगों की अस्थियां लिए नुमाईशकैंप निवासी राहुल झाम। जागरण

HighLights

  1. राहुल झाम की 10 सदस्यीय टीम करती है अंतिम संस्कार।

  2. 2019 से अब तक 600 से अधिक शवों का अंतिम संस्कार।

  3. कोविड महामारी में भी टीम ने निभाई महत्वपूर्ण भूमिका।

जागरण संवाददाता, सहारनपुर। शहर की सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर अक्सर ऐसे लोग दिखाई देते हैं, जिनका न कोई घर-ठिकाना होता है और न ही कोई अपना। जिंदगी किसी तरह गुजर जाती है, लेकिन जब मौत आती है तो उनके अंतिम संस्कार के लिए भी कोई आगे नहीं आता। ऐसे लोगों के लिए सहारनपुर में कुछ लोग ही उनके अपने बनकर सामने आते हैं। नुमाइश कैंप निवासी राहुल झाम और उनकी टीम के 10 सदस्य पिछले कई वर्षों से ऐसे ही बेसहारा और लावारिस लोगों का अंतिम संस्कार कर मानवता की अनूठी मिसाल पेश कर रहे हैं। मानवता के नाते इस कार्य को कर रहे राहुल झाम व उनके साथियों ने अपने संगठन का कोई नाम नहीं रखा है।

नुमाईश कैंप निवासी राहुल झाम और उनकी आठ सदस्यीय टीम वर्ष-2019 से इस सेवा कार्य में जुटी है। पुलिस या प्रशासन की सूचना मिलने पर टीम के सदस्य ऐसे शवों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी उठाते हैं, जिनका कोई वारिस सामने नहीं आता। अंतिम संस्कार के बाद अस्थियों का विधि-विधान से विसर्जन भी टीम के सदस्य स्वयं करते हैं। उनके लिए यह महज एक सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि इंसानियत के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने जैसा है। इस सेवा कार्य के लिए राहुल झाम और उनकी टीम किसी व्यक्ति, संस्था या संगठन से आर्थिक सहयोग नहीं लेती।

टीम के सदस्य आपस में ही धन एकत्र करते हैं और उसी से अंतिम संस्कार की आवश्यक व्यवस्थाएं पूरी की जाती हैं। लकड़ी से लेकर अन्य जरूरी सामग्री और अस्थि विसर्जन तक का खर्च सदस्य मिलकर उठाते हैं। इसमें करीब आठ से दस हजार रुपये का खर्चा आता है। अब तक वह 600 के करीब लोगों का अंतिम संस्कार करा चुके हैं। इसके साथ ही वह अस्थित विसर्जन करने के लिए हरिद्वार के कनखल स्थित सती घाट पर जाते हैं।

राहुल झाम बताते हैं कि जब किसी ऐसे व्यक्ति को अंतिम विदाई दी जाती है, जिसके लिए दुनिया में कोई अपना नहीं बचा, तो मन को एक अलग तरह की शांति मिलती है। उनका मानना है कि जीवन में हर व्यक्ति को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है और मृत्यु के बाद सम्मानजनक अंतिम विदाई मिलना भी उसका हक है।

कोरोना महामारी का दौर इस टीम की सेवा भावना की सबसे बड़ी परीक्षा रहा। उस समय लोग अपने करीबी परिजनों के शवों को छूने से भी डर रहे थे। संक्रमण के भय के कारण कई परिवारों के सामने अंतिम संस्कार की चुनौती खड़ी हो गई थी। ऐसे मुश्किल समय में राहुल झाम और उनकी टीम ने आगे बढ़कर शवों का अंतिम संस्कार कराया।