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सहारनपुर में प्रेग्नेंट पत्नी के हत्यारे पति को उम्रकैद, कोर्ट ने कहा- ये जीवन नहीं, विश्वास की हत्या 

Published: Thu, 01 Oct 2026 09:06 AM (IST)

सहारनपुर की फास्ट ट्रैक कोर्ट ने आठ साल पुराने गंगोह के पिंकी हत्याकांड में पति आशीष को दोषी करार दिया ...और पढ़ें

प्रतीकात्मक तस्वीर।

प्रतीकात्मक तस्वीर।

HighLights

  1. गर्भवती पत्नी पिंकी की हत्या का दोषी पति आशीष।

  2. फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सुनाई आजीवन कारावास की सजा।

  3. एक लाख रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया।

जागरण संवाददाता, सहारनपुर। आठ साल पुराने गंगोह के मोहल्ला मखदूम जहां में नव विवाहित पिंकी को जान से मारने के आरोपित पति आशीष को फास्ट ट्रैक कोर्ट संख्या एक के अपर सत्र न्यायाधीश श्रेय शुक्ला ने हत्या का दोषी माना है।

फैसला सुनाते हुए अदालत ने आशीष को आजीवन कारावास और एक लाख रुपए अर्थदंड की सजा सुनाई है। सहायक जिला शासकीय अधिवक्ता सतीश कुमार सैनी ने बताया कि मामले की शिकायत पक्की गढ़ी जिला शामली के संजय ने 28 मई 2018 को थाना गंगोह में दर्ज कराई थी।

कहा गया था कि संजय की बेटी पिंकी का विवाह आशीष पुत्र नरेश के साथ तीन नवंबर 2017 को हुआ था। जिसमें काफी दान दहेज दिया गया था। लेकिन पिंकी के ससुराल वाले दहेज से खुश नहीं थे, और दहेज की मांग करते थे। इसी के चलते पिंकी को प्रताड़ित किया जाता था। 28 मई की सुबह पिंकी की ससुराल के पड़ोस से फोन पर सूचना मिली कि पिंकी कि गला रेत कर हत्या कर दी गई।

यहां यह भी उल्लेखनीय है कि आशीष के गर्दन पर भी चोट के निशान थे। जिसके चलते उसे पीजीआई चंडीगढ़ रेफर करना पड़ा। जहां तीन माह तक इलाज चला।

इस मामले में पुलिस ने चार नवंबर 2018 और 13 फरवरी 2019 को आशीष उसकी माता रामो, भाई सिकंदर और भाभी बबीता के खिलाफ दहेज उत्पीड़न व दहेज हत्या जैसे की धारा में चार्जशीट पेश की। वही, आशीष का कथन था कि रात के समय उसके घर चोर घुसे थे जिन्होंने पिंकी व आशीष दोनों पर हमला किया।

दोनों पक्षों की बहस सुनने तथा पत्रावली पर आए साक्ष्य के आधार पर अदालत ने पाया कि इस मामले में आशीष पिंकी की हत्या का दोषी है। यह हत्या दहेज के कारण भले ही ना हुई हो लेकिन गर्भवती पिंकी को आशीष ने उस्तरे के सात वार कर मारा। स्वयं की भी जान लेने की कोशिश की।

अदालत ने हत्या के लिए आशीष को उम्र कैद तथा जुर्माने के रूप में एक लाख के अर्थदंड की सजा सुनाई। इस मामले में अदालत ने आशीष की माता रामो, भाई सिकंदर और भाभी बबीता को आरोप सिद्ध न होने के कारण संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया।

जीवन की नहीं, विश्वास की हत्या: अदालत

आशीष को हत्या के मामले में सजा सुनाते वक्त न्यायाधीश श्रेय शुक्ला ने अपने आदेश में लिखा कि एक जीवन का अंत केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है। वह उसके परिवार के संबंधों, आशाओं और भविष्य पर भी अमिट प्रभाव छोड़ता है। आशीष ने अपनी जीवन संगिनी की हत्या उस समय की, जब वह गर्भवती थी।

जिस व्यक्ति के साथ जीवन की यात्रा साझा करने का संकल्प लिया गया था। उसी के हाथों उसके जीवन का अंत कर देना केवल एक व्यक्ति की हत्या नहीं, बल्कि विश्वास के उस बंधन की भी निर्मम हत्या है, जिस पर वैवाहिक संबंध आधारित होते हैं। विवाह का संबंध जीवन, सुरक्षा और विश्वास का संबंध है।

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