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सहारनपुर का मिरगपुर! सिर्फ सात्विक है गांव का खानपान, प्याज-लहसुन से भी परहेज रखते हैं ग्रामीण

By Sanjeev Kumar Gupta Edited By: Praveen Vashishtha
Published: Sun, 16 Aug 2026 04:12 PM (IST)

देवबंद का मिरगपुर गांव 500 सालों से नशामुक्त और सात्विक खानपान के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ ग्रामीण मांस, मदिरा, धूम्रपान ...और पढ़ें

देवबंद के गांव मिरगपुर में गुरु बाबा फकीरादास की तपोस्थली। जागरण

देवबंद के गांव मिरगपुर में गुरु बाबा फकीरादास की तपोस्थली। जागरण

HighLights

  1. मिरगपुर गांव 500 साल से नशामुक्त और सात्विक जीवनशैली अपनाता है।

  2. ग्रामीण मांस, मदिरा, धूम्रपान और प्याज-लहसुन का सेवन नहीं करते।

  3. गांव मिरगपुर इंडिया और एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज हुआ है।

जागरण संवाददाता, सहारनपुर। देवबंद क्षेत्र का नशामुक्त गांव मिरगपुर देशभर में पहचान बना चुका है। यहां के लोग पिछले 500 साल से मांस-मदिरा का सेवन अथवा धूमपान-शराब आदि का भी नशा नहीं करते। ग्रामीण प्याज-लहसुन तक से भी परहेज रखते हैं। नशा मुक्ति और सात्विक खानपान के लिए विशेष पहचान रखने वाले मिरगपुर का नाम इंडिया बुक आफ रिकार्ड के बाद एशिया बुक आफ रिकार्ड में दर्ज हो चुका है।

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ऐतिहासिक नगर देवबंद से आठ किलोमीटर दूर मंगलौर रोड पर काली नदी के तट पर बसा गांव मिरगपुर तामसिक व मादक पदार्थों से दूर है यह गांव अपने खास रहन-सहन और सात्विक खानपान के लिए विख्यात है। नशा मुक्ति और सात्विक खानपान के लिए विशेष पहचान रखने वाले मिरगपुर में किसी भी दुकान पर नशे का सामान नहीं बिकता है। यहां के लोग मांस, मदिरा का सेवन और बीड़ी, सिगरेट सहित धूम्रपान सहित किसी भी नशीले पदार्थ का सेवन नहीं करते हैं। दैनिक खाने-पीने की चीजों में भी प्याज-लहसुन तक से परहेज करते हैं। सभी लोग शुद्ध शाकाहारी हैं।

बड़े-बुजुर्गों के अनुसार पंजाब के संगरूर क्षेत्र से बाबा फकीरादास 500 वर्ष पहले मिरगपुर आए थे और यहां कठिन तपस्या की थी। तपस्या के दौरान बाबा ने खुशहाल जीवन के लिए यहां के लोगों से मादक व तामसिक खाद्य पदार्थ मांस, मछली, लहसुन, प्याज व मदिरा आदि का सेवन न करने की प्रतिज्ञा ली थी। यहां बाबा गुरु फकीरादास की समाधि है और उनकी याद में हर साल मेला लगता है। मेले के दौरान ग्रामीण, अपने रिश्तेदारों को घर बुलाते हैं, इस दिन खाने-पीने की सभी चीजें देसी घी में बनाती है। गांव को नशामुक्त बनाने में यहां के युवाओं ने अहम योगदान दिया है। लोग इसे बाबा फकीरा दास का आशीर्वाद मानते हैं। यहां के युवा हो या बूढ़े सभी लोग व्यायाम और खेलकूद पर अधिक ध्यान देते है।

ग्रामीणों का कहना है कि यह गुरु बाबा फकीरादास की पवित्र भूमि है, उन्हीं के प्रताप से पिछले 500 वर्ष से गांव पूरी तरह से सात्विक है। गांव का कोई भी व्यक्ति शराब जैसे व्यसनों का सेवन नहीं करता है, जिस कारण यह गांव दूर-दूर तक मशहूर है। अगर किसी की शादी में अन्य गांव में जाना हो तो वहां पर भी लहसुन-प्याज का खाना नहीं खाया जाता। गांव की चर्चा प्रदेश में नहीं बल्कि पूरे देश में है, इसलिए गांव को देश का सबसे पवित्र गांव कहा जाता है।

वर्ष-2020 में गांव का नाम इंडिया बुक आफ रिकार्ड में तथा 2022 में गांव का नाम एशिया बुक आफ रिकार्ड में दर्ज हुआ था। गांव के निवासी पूर्व ब्लाक प्रमुख परविंदर कुमार बताते है कि नशामुक्त गांव की परंपरा का सभी लोग स्वयं से पालन करते है। गिनीज बुक आफ वर्ल्ड रिकार्ड में गांव का नाम शामिल कराने के लिए आवेदन किया हुआ है।