रामपुर (मुस्लेमीन)। पुलिस का सिस्टम भी अजीब है। बदमाशों से मुठभेड़ करने वाले इनाम पा जाते हैं लेकिन, सीआरपीएफ हमले के दौरान आतंकियों का डटकर मुकाबला करने वाले पुलिसकर्मियों को आज तक कोई सम्मान नहीं मिल सका है। इस हमले में सिपाही इंद्रपाल ङ्क्षसह ने आतंकियों को मुंहतोड़ जवाब दिया था। रायफल से पांच राउंड गोली चलाई, जिससे आतंकी भागने लगे लेकिन, जाते-जाते इंद्रपाल पर हैंडग्रेनेड से हमला कर दिया। इससेे वह बुरी तरह जख्मी हो गए। आज भी उनके शरीर में हैंडग्रेनेड के सैकड़ों छर्रे मौजूद हैं। सर्दी के दिनों में उनके हाथ पैर जाम हो जाते हैं। दवा खाने के बाद ही काम कर पाते हैं लेकिन, जान पर खेलकर आतंकियों का मुकाबला करने वाले इस वीर सिपाही को आज तक कोई सम्मान नहीं मिल सका है। यह अलग बात है कि बदमाशों को मुठभेड़ में गिरफ्तार करने वाले पुलिस कर्मियों को आए दिन पुरस्कार मिलते रहते हैं। 

सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर पर 31 दिसंबर 2007 की रात आतंकियों ने हमला किया था, जिसमें सात जवान शहीद हुए थे। एक रिक्शा चालक की भी जान गई थी। मुठभेड़ के दौरान ही सिविल लाइंस थाने में तैनात सिपाही इंद्रपाल ङ्क्षसह भी दारोगा ओम प्रकाश शर्मा के साथ गश्त करते हुए पहुंच गए थे। दारोगा ने रिवॉल्वर से गोली चलाई तो सिपाही इंद्रपाल ने रायफल से पांच राउंड गोली चलाई। इंद्रपाल बताते हैं कि रात के करीब तीन बजे थे। कोसी नदी की ओर से पुलिस टीम के साथ आ रहे थे। सीआरपीएफ के गेट नंबर एक पर ताबड़तोड़ गोलियों की आवाज सुनाई दी। मौके पर जाकर देखा तो वहां आतंकवादी गोली चला रहे थे। तुरंत ही मोर्चा संभाला और आतंकवादियों पर फायङ्क्षरग शुरू कर दी। रायफल से पांच राउंड गोली चलाई, जिससे आतंकियों के पैर उखड़ गए और भागने लगे। लेकिन, जाते-जाते तीन चार हैंडग्रेनेड उनकी तरफ भी फेंक गए, जिससे उनकी रायफल की बट टूट गई और वह बुरी तरह जख्मी हो गए। उनके शरीर में बड़ी संख्या में हैंडग्रेनेड के छर्रे घुस गए। उन्हें उपचार के लिए तत्काल मुरादाबाद के साईं अस्पताल ले जाया गया। वहां से मेरठ के मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया, जहां लंबे समय तक इलाज चला। हैंडग्रेनेड के छर्रे दोनों पैरों, दोनों हाथों और सीने के ऊपर गर्दन तक लगे। वह कहते हैं कि अगर हम रायफल से गोली नहीं चलाते तो आतंकवादी सीआरपीएफ के अंदर घुसकर और भी ज्यादा जवानों की जान ले सकते थे लेकिन, हमारे गोली चलाने से भाग खड़े हुए। उनके साथ होमगार्ड आफताब भी घायल हो गया था। 

पुरस्कार न मिलने का मलाल

इंद्रपाल ङ्क्षसह को इस बात का मलाल है कि विभाग की ओर से आज तक उन्हें न तो आउट ऑफ टर्न प्रोमोशन मिला और न ही कोई पुरस्कार। कहते हैं कि इस घटना के बाद रामपुर पुलिस लाइन में पुलिस कर्मियों का दरबार बुलाया था, जिसमें उन्हें भी बुलाया गया। तत्कालीन पुलिस अधीक्षक वीर बहादुर ङ्क्षसह के सामने उन्होंने अपनी बात रखी थी कि उन्होंने बहादुरी के साथ आतंकवादियों का मुकाबला किया लेकिन, कोई मेडल और आउट ऑफ टर्न प्रोमोशन नहीं मिल सका। तत्कालीन क्षेत्राधिकारी ज्ञानन्जेय ङ्क्षसह ने उनकी बात को सही ठहराया और उनकी फाइल तैयार करने के लिए कहा। तब सिविल लाइन थाने के प्रभारी सुमित कुमार ङ्क्षसह थे। उन्होंने पुरस्कार दिलाने के लिए फाइल तैयार की। सीओ सिटी ने भी उनकी फाइल को आगे बढ़ा दिया लेकिन, पुलिस अधीक्षक के दफ्तर से आगे फाइल नहीं बढ़ सकी। उसे बाबुओं ने यही बता दिया कि तुम्हारी फाइल कहीं गुम हो गई है। दारोगा ओम प्रकाश शर्मा को भी कोई पुरस्कार नहीं मिल सका और रिटायर्ड हो गए। वह कहते हैं कि इतना सबकुछ होने के बावजूद एक गुड एंट्री तक नहीं दी गई। 

इलाज पर लाखों खर्च, मिले 70 हजार 

इंद्रपाल ङ्क्षसह बताते हैं कि उनके इलाज के नाम पर कई लाख रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन, उन्हें केवल 70 हजार ही मिले हैं। जब वह गंभीर रूप से घायल होने के बाद मेडिकल कॉलेज मेरठ में भर्ती थे, तब 20 हजार रुपये पुलिस अधीक्षक की ओर से दारोगा जी लेकर गए थे। इसके बाद 50 हजार की सहायता सरकार की ओर से दी गई। इंद्रपाल अमरोहा जिले के डिडौली थानांतर्गत पतेई खालसा गांव के निवासी हैं और इस समय पीलीभीत जिले के बरखेड़ा थाने में हेड कांस्टेबल हैं। उन्होंने आतंकियों के खिलाफ अदालत में भी ठोस गवाही दी। चार आतंकियों को फांसी की सजा मिलने से वह बहुत खुश हैं। 

फाइल का पता कराएंगे एसपी

पुलिस अधीक्षक डा. अजय पाल शर्मा कहते हैं इंद्रपाल ङ्क्षसह का मामला उनकी जानकारी में नहीं है। अगर उनकी फाइल तैयार हुई थी तो वह उसे दिखवाएंगे, आखिर उन्हें पुरस्कार क्यों नहीं मिला, यह फाइल देखकर ही पता चल सकेगा। अगर संस्तुति की गई है तो उसे पुरस्कार दिलाने के लिए प्रयास करेंगे।

 

Posted By: Narendra Kumar

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