रायबरेली : 15 साल पहले जिले में 107 बरातघरों के निर्माण के लिए 7.47 करोड़ का बजट अवमुक्त किया गया था। कार्यदायी संस्था यूपी एग्रो के जिला प्रबंधक ने सरकारी धन में बंदरबांट की। इसकी वजह से निर्माण कार्य पूरे नहीं हो सके। मामला न्यायालय पहुंचा और 2013 में आरोपित को सात साल की सजा सुनाई गई। आरोपित ने इस फैसले के खिलाफ जिला जज के न्यायालय में अपील की। यहां पूर्व के फैसले को बरकरार रखते हुए आरोपित को जेल भेज दिया गया।

वर्ष 2006 में बरातघरों के निर्माण का काम ग्राम्य विकास अभिकरण ने कार्यदायी संस्था यूपी एग्रो को सौंपा था। तत्समय संस्था के प्रबंधक अशोक कुमार श्रीवास्तव थे, जोकि लखनऊ के मधुबन नगर, कृष्णा नगर के मूल निवासी हैं। गांवों में बरातघर न बनने पर इसकी शिकायतें जिला मुख्यालय पहुंचने लगीं। प्रारंभिक जांच में अनियमितता की बात सामने आने पर तत्कालीन ग्राम्य विकास अभिकरण के परियोजना निदेशक प्रेम प्रकाश त्रिपाठी ने दो अगस्त 2008 को अशोक श्रीवास्तव के खिलाफ गबन व जालसाजी का केस दर्ज कराया था। इस मामले की सुनवाई पहले अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट में हुई। 26 जून 2013 को सीजेएम ने आरोपित को गबन का दोषी मानते हुए सात साल की सजा और दस हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई। इस निर्णय के खिलाफ अभियुक्त ने जिला जज की अदालत में अपील की, जिसके बाद उसे जमानत पर छोड़ दिया गया। लगभग आठ साल सुनवाई के बाद जिला जज अब्दुल शाहिद ने भी आरोपित को गबन का दोषी पाया और उसकी सजा बरकरार रखी। न्यायालय के आदेश पर उसे जेल भेज दिया गया। 1.62 करोड़ का घपला

बरातघर के लिए 7.47 करोड़ का बजट दिया गया, जिसमें 1.62 करोड़ रुपये का गबन कर लिया गया। ये विकास विभाग के अफसरों की जांच में पहले ही सामने आ चुका था। बताया गया कि बैंक में एग्रो के नाम से खाता बनाकर धन का आहरण किया गया और फिर उसका गलत उपयोग किया गया। सुनवाई के दौरान विभागीय अफसरों, बैंक कर्मियों के अलावा कई ग्राम प्रधानों के भी बयान दर्ज किए गए।

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