सरेनी (रायबरेली) : एक बात तो सौ फीसद सच है कि लॉकडाउन ने व्यापार की कमर तोड़ दी। ऐसे में व्यापारियों का परेशान होना लाजमी है। लेकिन, जिसने हिम्मत से काम लिया, वह उसने संकट से भी रोजी-रोटी का रास्ता ढूंढ लिया है। व्यापार भले ही खत्म हो गया, लेकिन परिवार का पेट किसी न किसी तरह पाल ही रहा है। कुछ ऐसा ही जज्बा सरेनी क्षेत्र के धूरेमऊ गांव निवासी छंगू भी रखते हैं।

वैसे तो इनका पुस्तैनी कारोबार बांस की डलिया और हाथ वाले पंखे बनाने का था। लेकिन, बढ़ती जरूरतों और महंगाई को देखते हुए छंगू को दूसरी राह पकड़नी पड़ी। वर्ष 1984 में ब्रास बैंड का काम शुरू कर दिया। किस्मत ने साथ दिया और मेहनत रंग लाई। जिससे काम चल पड़ा। छंगू के घर की गाड़ी तो बिना रुकावट चलने ही नहीं लगी, बल्कि आसपास के भी करीब 40 लोगों को उनके ब्रास बैंड में रोजगार मिला। सब कुछ ठीक चल रहा था। इसी बीच कोरोना ने अपने कदम जमा दिए और लॉकडाउन घोषित हो गया। दूसरे व्यापार की तरह छंगू का व्यवसाय भी ठप हो गया। ऐसे में अब छंगू ने अपना पुस्तैनी काम संभाल लिया है। ताकि घर की गाड़ी चलती रहे।

बहुत बचत नहीं, पर काम चल रहा है

छंगू का कहना है कि इस काम में जितनी मेहनत है, उतनी आमदनी नहीं। लेकिन, मुसीबत के समय में अपना पुस्तैनी काम ही सहारा बना। बहुत ज्यादा बचत भले नहीं होती। मगर, इस व्यवसाय से परिवारजनों के पेट की आग जरूर बुझ जाती है। किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता।

पूरा परिवार करता सहयोग

बांस से डलिया, हाथ के पंखे व अन्य जरूरत के सामान बनाने में छंगू के साथ उसका पूरा परिवार मेहनत करता है। पत्नी पुताना, बेटों लक्ष्मीकांत, रजनीकांत, राजकरन और बेटी रजनी मिलकर पसीना बहाते हैं, तो कहीं घर का चूल्हा जलता है। हालांकि, छंगू को यह बात रह-रहकर कचोट रही है कि वह ब्रास बैंड में काम करने वाले अपने साथियों की मदद नहीं कर पा रहे।

Posted By: Jagran

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