रायबरेली (रसिक द्विवेदी)। अमेठी में राहुल गांधी को हराकर उत्साहित भाजपा अब रायबरेली को भी कांग्रेस से मुक्त करने की तैयारी में है। इसके खातिर उसके पहले निशाने पर है 2022 का विधानसभा चुनाव। हालांकि जिले में अभी सत्ता दल के तीन विधायक हैं। लेकिन, पार्टी चाहती है कि सभी छह सीटें उसके कब्जे में आ जाएं, ताकि अगले लोकसभा चुनाव में इस संसदीय सीट पर भी कमल खिलाया जा सके। अंदरखाने में सधी हुई रणनीति बन रही है। शायद इसी का नतीजा है कि उप मुख्यमंत्री को यहां का प्रभारी बनाया गया है।  

रायबरेली यूं तो राजनीति के एक ही रंग का मुरीद रही है, लेकिन वक्त-बेवक्त यहां के लोगों ने इतिहास भी मोड़ा है। यह वही धरती है जहां भारत की प्रधानमंत्री को चुनाव हारना पड़ा था। केंद्र से लेकर प्रदेश तक सत्ता में बैठी भाजपा अब उन इलाकों को निशाने पर ले रही है, जहां कमल खिलाना टेढ़ी खीर माना जाता है। यह जिला उसी में एक है। तीन महीने पहले ही तो कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष व स्थानीय सांसद सोनिया गांधी बमुश्किल यहां से जीत पाईं। उन्हें भाजपा प्रत्याशी से 18 फीसद ज्यादा वोट मिले। 2014 के चुनाव में सोनिया करीब साढ़े तीन लाख वोटों से जीती थीं। वहीं 2019 में एक लाख 68 हजार 178 वोट ही मिले। इस बार नोटा (नन ऑफ द एबव) भी 10 हजार का आंकड़ा पार कर गया। जबकि 2014 में यह पांच हजार के पास था। इतना सब कुछ भाजपा के लिए सकारात्मक दिखा और अमेठी का परिणाम आते ही पार्टी गदगद हो गई। करीब 90 दिन खामोशी से आगे की रणनीति बनती रहीे। फिर यहां के प्रभारी मंत्री नंद गोपाल नंदी की जगह बागडोर उप मुख्यमंत्री दिनेश शर्मा को सौंप दी गई। अंदरखाने की चर्चा बताती है कि अब भाजपा की निगाह 2022 पर है। क्योंकि तीन सीटें उसके पास है और तीन सीटों पर ही उसे खास मेहनत करनी है। पार्टी के प्रदेश महामंत्री पंकज ङ्क्षसह इस ओर इस इशारे में ही अपनी बात कहते हैं 'कांग्रेस सिमटिती जा रही है। अमेठी इस बार जीत ली है। रायबरेली से कई विधायक हैं। यह बदलाव का ही परिचायक है। आगे हमें बढ़ते जाना है।Ó 

इन विस क्षेत्रों में भाजपा का कब्जा

बछरावां 

 सरेनी 

सलोन 

यहां है कांग्रेस और सपा

सदर (कांग्रेस)

हरचंदपुर (कांग्रेस)

ऊंचाहार (सपा)

Posted By: Anurag Gupta

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