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इलाहाबाद हाई कोर्ट की कड़ी टिप्पणी, 'राजनीतिक नेतृत्व को खुश करने के लिए काम करते हैं पुलिस अफसर'

Published: Sun, 07 Jun 2026 06:24 AM (IST)Updated: Sun, 07 Jun 2026 07:00 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के कामकाज पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस अफसर संविधान के बजाय सत्ताधारी दल के प्रति वफादार हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट।

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विधि संवाददाता, जागरण प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस के कामकाज पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि राज्य के पुलिस अफसरों की वफादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के प्रति है। फील्ड के अफसर ‘ट्रांसफर-पोस्टिंग इकोनमी’ ध्यान में रखकर आचरण तय करते हैं और राजनीतिक नेतृत्व को खुश करने के लिए काम करते हैं।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने इन तल्ख टिप्पणियों के साथ गाजियाबाद निवासी राजेंद्र त्यागी व दो अन्य के खिलाफ गैंग्सटर एक्ट की कार्रवाई निरस्त कर दी।

वफादार अफसरों को इनाम में मिलते हैं मलाईदार जिले

पीठ ने कहा, यह कड़वा सच है कि कई सरकारों में राज्य की प्रशासनिक मशीनरी राजनीतिक घुसपैठ का शिकार रही है। ट्रांसफर, पोस्टिंग, प्रमोशन प्रतिभा के आधार पर न होकर राजनीतिक सरपरस्ती के औजार बन गए हैं। वफादार अफसरों को मलाईदार जिले इनाम में मिलते हैं, जबकि स्वतंत्रता से काम करने वाले अफसरों को महत्वहीन जगहों पर भेज दिया जाता है।

कोर्ट ने लक्ष्य साध कर की गई कार्रवाई पर भी चिंता जताई। मुठभेड़, चुनिंदा क्रैकडाउन व ‘असुविधाजनक’ माने जाने वाले लोगों के खिलाफ यूपी गैंग्सटर एंड एंटी-सोशल एक्टिविटीज एक्ट 1986 के दुरुपयोग पर टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा, ‘गृह सचिव को कानून-व्यवस्था में सरकार की नीतियों को निष्पक्ष रूप से लागू करने वाला संवैधानिक प्राधिकार होना चाहिए, पर व्यवहार में कुछ अफसर इस पद पर पहुंचकर "स्वार्थी हितों के वाहक" बन जाते हैं।’ पोस्टिंग की सिफारिश, विभागीय कार्रवाई की मंजूरी और कोर्ट की कार्यवाही में जवाब देते समय उनमें निष्पक्ष संवैधानिक सोच की जगह ‘निजी या बाहरी’ वाली बात दिखती है। कानून के शासन को असुविधा की तरह देखा जाना लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है।

याची की तरफ से कहा गया कि गाजियाबाद कमिश्नरेट में गैंग चार्ट अनुमोदित करते समय जिलाधिकारी मीटिंग में नहीं थे। पुलिस कमिश्नर ने अकेले ही मंजूरी दे दी, जबकि नियमानुसार दोनों की संयुक्त बैठक जरूरी है।

कोर्ट ने गाजियाबाद के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा को भी कड़ी चेतावनी दी। उनकी ही निगरानी में गलत गैंग चार्ट अनुमोदित हुआ था। अभियोजन ने राजेंद्र त्यागी को गैंग लीडर व उसके बेटे दीपक त्यागी को सदस्य बताया। बहू ललिता के खिलाफ भी कार्रवाई की गई थी।

आरोप था कि पिता-पुत्र ने गाजियाबाद और जालौन में जमीन देने के नाम पर करोड़ों की धोखाधड़ी, फर्जीवाड़ा,आपराधिक धमकी दी। इसी आधार पर दर्ज प्राथमिकी के क्रम में गैंग्सटर लगाया गया।

कानपुर के बहुचर्चित बिकरु कांड का भी उल्लेख

कोर्ट ने अपने आदेश में कानपुर के बहुचर्चित बिकरु कांड का उल्लेख किया है। इस घटना में क्षेत्राधिकारी (सीओ) समेत आठ पुलिसकर्मी बलिदान हुए थे। पुलिस टीम गैंग्सटर विकास दुबे को पकड़ने गई थी। कोर्ट ने कहा, पूरे आपरेशन की निगरानी करने वाले अधिकारी को ‘फार्मल काशन’ यानी औपचारिक चेतावनी भर मिली।

कोर्ट ने कहा, उसे समझना मुश्किल भरा लग रहा है कि इतनी बड़ी निगरानी की चूक के बाद सजा सिर्फ औपचारिक चेतावनी कैसे हो सकती है? ऐसी "इंस्टीट्यूशनल इम्प्युनिटी" (संस्थागत जवाबदेही से मुक्ति) की संस्कृति से अफसर बेलगाम हो जाते हैं और जवाबदेह नहीं रहते।

संवैधानिक शासन को व्यक्तिगत स्वार्थ या सुविधा के अधीन नहीं किया जा सकता। राज्य तंत्र को कानून और संविधान के प्रति उत्तरदायी रहना चाहिए, न कि किसी सत्ताधारी प्रतिष्ठान के प्रति। ‘सामंती मानसिकता’ वाले नेता और अफसरों ने संवैधानिक शासन को जनता की सेवा का माध्यम बनाने की बजाय निजी हुकूमत का औजार बना दिया है। - इलाहाबाद हाई कोर्ट