धान की खड़ी फसल में गेहूं की बोआई... जी हां, इस नई तकनीक से प्रयागराज के किसान बढ़ा रहे उत्पादन, पराली जलाने से भी छुटकारा
प्रयागराज के किसान गेहूं की बोआई की एक अनोखी तकनीक अपना रहे हैं। धान की खड़ी फसल में कटाई से एक सप्ताह पहले गेहूं बोने से जुताई का खर्च बचता है और खाद भी कम लगती है। इस तकनीक से प्रति बीघे 4 से 7 क्विंटल अधिक उत्पादन हो रहा है। कोरांव क्षेत्र के 70% गांवों में किसान यह तरीका अपना रहे हैं, जिससे उनकी आमदनी बढ़ रही है।

प्रयागराज के कोरांव में धान की फसल कटने के बाद बिना जोताई के बोया गया गेहूं। जागरण
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। खेती में लागत घटाने व उपज बढ़ाने के लिए नई-नई तकनीकें लाई जा रहीं हैं। गेहूं की खेती में भी ऐसे कई प्रयोग हो रहे हैं। आज हम आपको जिस तकनीक के बारे में बताने जा रहे हैं, शायद वह आपके लिए भी अनोखी होगी। यह तकनीक है धान की खड़ी फसल में गेहूं की बोआई की। इस पद्धति ने धान का कटोरा कहे जाने वाले कोरांव क्षेत्र के अन्नदाताओं की आमदनी बढ़ा दी है।
धान की खड़ी फसल में गेहूं की बोआई
गेहूं की बोआई के लिए ज्यादातर जगह किसान धान का खेत खाली करने के बाद पलेवा और जोताई करके उसे तैयार करते हैं। यमुनापार के कोरांव इलाके में ऐसा नहीं है। इस तहसील क्षेत्र में 178 गांव हैं। इनमें से लगभग 70 प्रतिशत गांवों में धान की खड़ी फसल में कटाई से एक सप्ताह पहले ही गेहूं की बोआई कर दी जाती है।
इस तकनीक में खाद भी करीब 50 प्रतिशत कम लगती है
नीबी के किसान कमलेश्वर गौतम बताते हैं कि इस विधि से 15 बीघे में गेहूं की बोआई की है। इसमें धान कटने तक गेहूं के पौधे लगभग पांच से छह इंच के हो जाते हैं। धान कटने के बाद फसल को सिर्फ खाद देना रहता है। गेहूं की बोआई के समय जोताई में लगने वाला प्रति बीघे करीब 1200 से 1500 रुपये का खर्च बच जाता है। इस तकनीक में खाद भी करीब 50 प्रतिशत कम लगती है।
फसल को एक माह का समय अतिरिक्त मिलता है
धान की कटाई के दौरान टूटने वाले गेहूं के पौधों का बाद में ब्यास बढ़ जाता है। देवी बांध के नीरज पांडेय बताते हैं कि लगभग 60 बीघे में इसी तकनीक से गेहूं लगाया है। इस विधि में फसल को करीब एक महीने का समय अतिरिक्त मिलता है। सामान्य बोआई में प्रति बीघा चार से पांच क्विंटल गेंहू निकलता है तो वहीं इस विधि से गेहूं की खेती में आठ से 12 क्विंटल तक का उत्पादन होता है। यह विधि कहां से आई, इसकी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है, लेकिन सात आठ साल से यह कोरांव में किसानों की आमदनी बढ़ा रही है।
पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा
कोरांव क्षेत्र के सेमरिहा, तरांव, कोसफरा, समलीपुर, नीबी, देवीबांध, अयोध्या, बरौला, बढ़वारी, उल्दा आदि गांवों में इस विधि से खेती होती है। यह विधि पर्यावरण संरक्षण को भी बढ़ावा दे रही है। क्योंकि, पराली जलाने से गेहूं के पौधे भी नष्ट हो जाएंगे। इसलिए इस विधि से किसान खेती में धान के पुआल नहीं जलाते हैं।
इस विधि से किसानों को हो रहा लाभ : उप निदेशक कृषि
उप कृषि निदेशक पवन कुमार विश्वकर्मा का कहना है कि कोरांव में पैरा तकनीक से गेहूं की बोआई कर किसान लाभ कमा रहे हैं। यह विधि पहली बार कोरांव में ही देखी है। इसके लिए यहां के किसानों की जितनी सराहना की जाए वह कम है।

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