नीलामी में शामिल असफल बोलीदाता को चुनौती देने का अधिकार नहीं: हाई कोर्ट
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि नीलामी में असफल बोलीदाता को नीलामी प्रक्रिया को चुनौती देने का अधिकार नहीं है। न्यायमूर्ति अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति विकास की खंडपीठ ने एक याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया, जिसमें नीलामी में अनियमितताओं का आरोप लगाया गया था। न्यायालय ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास चुनौती देने का कोई कानूनी आधार नहीं है।

तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक निर्णय में कहा है कि व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता के चलते असफल बोली दाताओं द्वारा दायर की गई याचिका में अदालतों को हस्तक्षेप से बचना चाहिए। न्यायालय को अनुच्छेद 226 में अपनी विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग अत्यंत सावधानी से करने की जरूरत है। नीलामी में शामिल व्यक्ति असफल होने पर तकनीकी आधार पर प्रक्रिया को चुनौती नहीं दे सकता। ऐसी याचिका पोषणीय नहीं है।
कोर्ट ने कहा, सामान्य तौर पर कोर्ट को लोक कार्य के ठेके के टेंडर में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, ऐसा करने से अवरोध उत्पन्न होगा। न्यायमूर्ति शेखर बी सराफ तथा न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ल की खंडपीठ ने कासाना बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है।
कोर्ट ने कहा, शिकायत करने वाला कोई भी निविदाकर्ता या ठेकेदार सिविल कोर्ट में हर्जाना मांग सकता है। ऐसे में असफल निविदाकर्ताओं द्वारा किसी तकनीकी/प्रक्रियात्मक उल्लंघन को तूल देने के प्रयासों को प्रेरित नहीं करना चाहिए। अदालतें न्यायिक समीक्षा के अधिकार का प्रयोग कर हस्तक्षेप करने से बच सकती हैं। मामला प्रयागराज और लखनऊ में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों के आवास निर्माण से जुड़ा है।
इसके लिए 143 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली निविदा जारी की गई थी। याची और एक अन्य तकनीकी बोली के लिए योग्य पाए गए और उस तीसरे पक्ष का भी चयन किया गया, जिसे तकनीकी बोली के बाद शुरू में अयोग्य घोषित कर दिया गया था। याची ने बोलीदाता के चयन को इस आधार पर चुनौती दी कि वह वित्तीय बोली में भाग लेने का हकदार नहीं था, क्योंकि उसकी मूल तकनीकी बोली अयोग्य घोषित कर दी गई थी।
न्यायालय ने पाया कि बैंक गारंटी बाद में अपलोड करना मात्र तकनीकी त्रुटि थी। बोलीदाता को निविदा में भाग लेने की अनुमति देने का निर्णय बुनियादी ढांचा परियोजना के हित में था। टाटा मोटर्स लिमिटेड बनाम बृहन मुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग (बेस्ट) व अन्य तथा त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड बनाम अयप्पा स्पाइसेज मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा, ‘जब तक कोई गंभीर उल्लंघन इंगित न हो, न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। न्यायालय को केवल तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि व्यापक जनहित में हस्तक्षेप की आवश्यकता है।’

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