आंखें बंद हों तो भी किसी की दुनिया रोशन हो सकती है, 1500 से अधिक नेत्रहीनों को ज्योति देने वाले 'भगीरथ' हैं डॉ. एसपी सिंह
प्रयागराज में मनोहर दास नेत्र चिकित्सालय के डॉ. एसपी सिंह ने 1500 से अधिक नेत्रहीनों को कॉर्निया प्रत्यारोपण से रोशनी ...और पढ़ें

प्रयागराज के मनोहर दास नेत्र चिकित्सालय में नेत्रहीन व्यक्ति की आंख में कार्निया प्रत्यारोपित करते सर्जन डॉ. एसपी सिंह। सौजन्य : स्वयं
HighLights
मोतियाबिंद आपरेशन के अलावा नेत्र ज्योति बांटने का चला रखा है अभियान
प्रत्येक वर्ष औसत 40 नेत्रहीनों को दुनिया देखने की खुशहाली तक ले जाते हैं
अमरदीप भट्ट, जागरण, प्रयागराज। मृत्यु के बाद शरीर की सांसें थम जाती हैं लेकिन आंखों की रोशनी किसी और की जिंदगी में सूरज बन सकती है। मनोहर दास नेत्र चिकित्सालय के नेत्र सर्जन डॉ. एसपी सिंह ने करीब तीन दशक में इस उजाले को अंधेरी आंखों तक पहुंचते देखा है। उनके अनुभव में नेत्रदान महज पुण्य का काम नहीं, बल्कि समय के खिलाफ पूरी की जाने वाली चिकित्सा प्रक्रिया है।
एक चूक से जरूरतमंद की आंखों को रोशनी नहीं मिलती
कई लोग जीवन रहते नेत्रदान का संकल्प लेते हैं, प्लेज कार्ड भरते हैं मगर मृत्यु के बाद परिवार की एक छोटी-सी चूक, सूचना में देरी या रिश्तेदारों की भ्रांति किसी जरूरतमंद की आंखों तक पहुंचने वाली रोशनी को हमेशा के लिए रोक देती है। डॉ. एसपी सिंह कहते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती नेत्रदान की इच्छा पैदा करना नहीं, बल्कि उस इच्छा को मृत्यु के बाद सही समय पर अमल तक पहुंचाना है।
नेत्रदान, कार्निया प्रत्यारोपण में कई बार चुनौती भी रही
अस्पताल के नेत्र बैंक और इसमें होने वाले नेत्रदान के चलते अब तक 1500 से अधिक लोगों की आंख में रोशनी पहुंचा चुके डॉ. एसपी सिंह मरीजों की आंखों की एक-एक नस पर नियंत्रण रखते हैं। कई बार नेत्रदान और कार्निया प्रत्यारोपण आसानी से हो जाता है तो कई बार चुनौती भी रही। प्रयागराज ही नहीं, कौशांबी, फतेहपुर, प्रतापगढ़, चित्रकूट, रीवा तक तमाम ऐसे लोग हैं जो इनके हाथों लगी कार्निया से दुनिया देख पा रहे हैं।
नेत्रदान बड़ा परोपकार
डॉ. सिंह कहते हैं कि मृत्युपरांत बिना देरी किए दान हुआ कार्निया दो मामलों में अहम हो जाता है। जिसके लिए दुनिया अंधेरी हो चुकी है उसे एक ही आंख में ज्योति मिल जाए तो यह उसकी जिंदगी में उजाले की तरह हो जाता है। जिसकी आंख से मृत्युपरांत कार्निया लिया गया, उसके स्वजन को भी आत्मसंतुष्टि पहुंचती है कि यह बड़ा परोपकार हो गया।
220 लोगों को है आस, किसी तरह मिल जाए रोशनी
मूल रूप से फतेहपुर निवासी डॉ. एसपी सिंह ने मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और एमएस किया। वह इसी मेडिकल कॉलेज में प्राचार्य भी रहे हैं। 12 घंटे में 250 मरीजों की आंखों का आपरेशन करके नया रिकार्ड उनके नाम दर्ज है। वर्ष 2002 में भी 89 मरीजों की आंखों का ऑपरेशन करके लिम्का बुक आफ रिकार्ड में अपना नाम दर्ज कराया था।
हर व्यक्ति को नेत्रदान के प्रति जागरूक होना चाहिए
वह कहते हैं कि नेत्रदान केवल किसी व्यक्ति को रोशनी देने का माध्यम नहीं, बल्कि मृत्यु के बाद भी जीवन में उजाला बनाए रखने का संकल्प है। आंखों की कॉर्निया दान करने से ऐसे व्यक्ति को दुनिया देखने का अवसर मिल सकता है, जिसने किसी बीमारी या चोट के कारण अपनी दृष्टि खो दी है। डॉ. एसपी सिंह का मानना है कि मृत्यु के बाद शरीर तो पंचतत्व में विलीन हो जाता है, लेकिन नेत्रदान से किसी दूसरे इंसान की जिंदगी में रोशनी लौट सकती है। इसलिए हर व्यक्ति को नेत्रदान के प्रति जागरूक होना चाहिए और परिवार को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए।
1460 लोगों ने नेत्रदान का संकल्प पत्र भरा है
मनोहर दास नेत्र चिकित्सालय के नेत्र बैंक में 220 जरूरतमंद लोगों का पंजीकरण अब भी है जिन्हें दृष्टिहीनता से मुक्ति पाने की लालसा है। बीते तीन साल में 1460 लोगों ने प्लेज कार्ड (नेत्रदान का संकल्प पत्र) जमा किया। वर्ष 2024-25 में 520, 2025-26 में 460 और 2026 में अब तक 480 लोगों के प्लेज कार्ड जमा हुए हैं। मनोहर दास नेत्र चिकित्सालय में डा. एसपी सिंह 2012-13 से अब तक 664 लोगों की आंख में कार्निया प्रत्यारोपण कर रोशनी पहुंचा चुके हैं। प्रत्येक वर्ष औसत 40 नेत्रहीनों की आंख में रोशनी पहुंचाने का क्रम चल रहा है। बीते तीन साल के आंकड़े बताते हैं कि 2024-25 में 40, 2025-26 में 45 और 2026 में अब तक 40 दृष्टिहीनों को दुनिया देखने के लिए रोशनी मिल चुकी है।
रिश्तेदार बन जाते हैं बाधा
घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर अचानक से दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है। बेटे, बहुएं, नाती-पौत्र की मानसिक स्थिति तब तनावपूर्ण रहती है। किसी एक के मन में विचार कौंधता है कि नेत्रबैंक को सूचना दे दी जाए लेकिन मानसिक भटकाव तब हो जाता है जब घर आए रिश्तेदार बरगला देते हैं। डा. एसपी सिंह कहते हैं कि कई बार नेत्रदान का संकल्प ले चुके व्यक्ति का मृत्युपरांत नेत्रदान होता ही नहीं है। यह छोटी सी चूक उस व्यक्ति की आत्मा को परेशानी करने जैसी है।
