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इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला: लंबे समय तक आपसी सहमति से बने संबंध दुष्कर्म नहीं, आरोपित बरी

Published: Tue, 14 Jul 2026 10:29 AM (IST)

कोर्ट ने आरोपी सौरभ पाल सिंह को सभी आरोपों से बरी करते हुए कहा कि झूठे वादे पर दुष्कर्म साबित ...और पढ़ें

सांकेतिक तस्वीर।

सांकेतिक तस्वीर।

HighLights

  1. आपसी सहमति से संबंध दुष्कर्म नहीं, शादी वादा टूटने पर।

  2. आरोपी सौरभ पाल सिंह को कोर्ट ने सभी आरोपों से बरी किया।

  3. जातिगत मंशा के अभाव में एससी/एसटी एक्ट लागू नहीं।

विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि आपसी सहमति से बालिगों के बीच लंबे समय तक चले शारीरिक संबंधों को शादी का वादा पूरा न होने पर दुष्कर्म नहीं कहा जा सकता। खासकर तब जब मूल विवाद मुख्य रूप से सिविल और आर्थिक प्रकृति का हो।

न्यायमूर्ति संतोष राय ने आरोपी सौरभ पाल सिंह को आईपीसी की धाराओं 376, 420, 406, 504 और 506 और एससी/ एसटी (अत्याचार निवारण) एक्ट की धारा 3(2)(v) के तहत सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।

कोर्ट ने प्रयागराज के स्पेशल जज (एससी/एसटी एक्ट) के उन आदेशों को रद किया, जिनमें उसकी डिस्चार्ज अर्जी (आरोपों से मुक्ति की अर्जी) को खारिज कर दिया गया था। इसके खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय किए गए।

मामले के अनुसार अक्टूबर 2020 में शिकायतकर्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पीएचडी कर रही अनुसूचित जाति की महिला है, उसने एफआईआर दर्ज कराई।

आरोपित ने लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाया

आरोप लगाया कि आरोपित ने शादी का वादा करके लंबे समय तक उसके साथ शारीरिक संबंध बनाया। रेस्तरां का व्यवसाय शुरू करने के बहाने उसका एटीएम कार्ड, स्कॉलरशिप का पैसा, गहने और 15 लाख रुपये ले लिया। व्यवसाय स्थापित होने के बाद शादी करने से इनकार कर दिया, उसने पांच-पांच लाख रुपये के दो चेक दिए, जो बाउंस हो गए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए बेंच ने दोहराया कि शादी के झूठे वादे के आधार पर किसी व्यक्ति पर दुष्कर्म का मुकदमा चलाने के लिए यह साबित होना चाहिए कि वादा करते समय ही वह झूठा था। वादा पूरा न करना किसी सिविल लेन-देन को धोखाधड़ी के आपराधिक अपराध में नहीं बदलता है।

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कोर्ट ने कही ये भी बात

कोर्ट ने आगे कहा कि ज्यादा रकम वाले दो चेक बाउंस होने के बावजूद, शिकायत करने वाली महिला ने न एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत कोई कार्रवाई शुरू की। न किसी सक्षम कोर्ट में पैसे की वसूली के लिए कोई मुकदमा दायर किया गया। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि सिर्फ इसलिए एससी/एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं बनता कि पीड़ित व्यक्ति अनुसूचित जाति से है।

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अभियोजन पक्ष को यह साबित करना होगा कि अपराध खास तौर पर पीड़ित की जातिगत पहचान के आधार पर किया गया था। कोर्ट को रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे जाति-आधारित मंशा या संबंध का पता चले।