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यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Sep 02, 2023 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।

Aditya L1: इलाहाबाद विश्वविद्यालय सौ वर्ष से कर रहा है सूर्य के वातावरण पर अध्ययन, आद‍ित्‍य एल1 खोलेगा रहस्‍य

By Jagran NewsEdited By: Prabhapunj Mishra
Published: Sat, 02 Sep 2023 12:04 PM (GMT+05:30)

Aditya L1 इसरो ने आज अपने पहले सूर्य मिशन आदित्य-एल1 (Aditya-L1) को लान्च कर दिया है। आदित्य-एल1 को सुबह 11.50 ...और पढ़ें

Aditya L1: आद‍ित्‍य एल1 खोलेगा सूर्य के रहस्‍य
Aditya L1: आद‍ित्‍य एल1 खोलेगा सूर्य के रहस्‍य

प्रयागराज, [मृत्युंजय मिश्र]। चंद्रमा पर कदम रखने के बाद सूर्य का अध्ययन करने के लिए भारत का आदित्य मिशन आज लांच हुआ है। अंतरिक्ष यान में लगे सात पेलोड की मदद से सूर्य के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारी जुटाई जाएगी। इलाहाबाद विश्वविद्यालय करीब सौ वर्ष पहले से ही सूर्य और उसके सन्निकट वातावरण पर अध्ययन कर रहा है।

भारत के तारकीय खगोल विज्ञानी और इलाहाबाद विश्वविद्यालय भौतिक विज्ञान के प्रो. मेघनाद साहा ने सौर विकिरणों का अध्ययन करने के लिए 1927 में ही तारकीय भट्टी का निर्माण किया था। इसमें तारकीय वातावरण बनाकर सूर्य, तारे एवं अन्य खगोलीय पिंडो से उत्सर्जित विकिरणों का विश्लेषण कर उनमें उपस्थित तत्वों के बारे में पता लगाया और आयनीकरण समीकरण विकसित कर तारों के अंदर की बात 1927 में ही बताई थी।

यह वर्तमान खगोलशास्त्र का आधार बना। इस खोज के लिए वह रायल सोसाइटी के फेलो चुने गए थे। इलाहाबाद विवि के प्रो. केएन उत्तम बताते हैं कि यह उच्चताप भट्टी (तारकीय भट्टी) ग्रेफाइट से बनी हुई है। इसमें सूर्य एवं तारों जैसा वातावरण प्रयोगशाला में बनाकर प्रकाश के स्पेक्ट्रम के आधार पर तत्वों और यौगिकों का पता लगाया गया।

इस वाटरकूल्ड (जलशीतलन) भट्टी में अधिकतम 3500 डिग्री सेल्सियस तापमान बना सकते हैं, जो कि सूर्य के सतही तापमान (5600 सेल्सियस) के सन्निकट है। इसमें क्वार्ट्ज से बनी चार विंडो हैं, जिससे निकलने वाले प्रकाश का स्पेक्ट्रोग्राफ से विश्लेषण तक तत्वों और यौगिकी की मौजूदगी का पता लगाया जा सकता है। भट्टी पराबैंगनी विकिरण एवं दृश्य प्रकाश विकिरण को एक साथ किसी भी पदार्थ से उत्सर्जित करने में सक्षम है।

भट्टी से प्राप्त विकिरणों का स्पेक्ट्रोफोटोमीटर से सपेक्ट्रम लेकर पदार्थ में पाए जाने वाले तत्वों और यौगिकी की पहचान एवं विश्लेषण किया जाता है। तारकीय वातावरण बनाकर इससे निकलने वाले विकिरणों का वातावरण पर प्रभाव का सटीक अध्ययन किया जाता है। प्रकाश के इसी स्पेक्ट्रम के आधार पर मेघनाथ साहा ने सूर्य में हीलियम और हाइड्रोजन की मौजूदगी का पता लगाया गया था।

प्रो. उत्तम कहते हैं कि सूर्य के कोरोना और सतह पर पाए जाने वाले तत्वों और यौगिकों का अध्ययन पूर्ण या आंशिक सूर्यग्रहण के समय ही संभव होता है। ऐसे में कोरोना के सटीक अध्ययन के लिए ही आदित्य मिशन लांच हो रहा है, जो एल-1 बिंदु से सूर्य के विकिरण, दृश्य विकिरण और पराबैंगनी विकिरण का अध्ययन का सूर्य का राज खोलेगा।

प्रो. उत्तम कहते हैं कि इस भट्टी को देखने के लिए रमन प्रभाव खोजने नोबल पुरस्कार प्राप्त विज्ञानी सर सीवी रमन भी अपने शिष्य और भौतिक विज्ञान विभाग में 1940 में विभागाध्यक्ष बने प्रो. केएस कृष्णन के बुलावे पर आते रहे हैं। इस भट्टी को लगातार किया गया परिष्कृत प्रो. मुरली मनोहर जोशी और उनके छात्रों ने इस भट्टी को परिष्कृत कर यौगिकों का अध्ययन के लिए तैयार किया था। इसका तापमान भी 3500 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचाने में कामयाबी प्राप्त की गई। प्रो. उत्तम बताते हैं अब आदित्य मिशन में लगे सात पेलोड सूर्य से निकलने वाली तीन विकिरणों का अध्ययन करेंगे।