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किरायेदारों को इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा झटका, अपील के दौरान भी हर महीने जमा करना होगा 50% किराया

Published: Sat, 03 Oct 2026 03:13 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने किरायेदारी विवाद, सिपाही भर्ती, टीजीटी हिंदी परीक्षा, और निजी संस्था में शिक्षक बर्खास्तगी जैसे कई महत्वपूर्ण मामलों पर फैसले सुनाए हैं।

किरायेदारी विवाद अपील में हर माह जमा करना होगा 50 प्रतिशत किराया: हाई कोर्ट।

किरायेदारी विवाद अपील में हर माह जमा करना होगा 50 प्रतिशत किराया: हाई कोर्ट।

HighLights

  1. किरायेदारी अपील में मासिक किराये का 50% जमा करना होगा

  2. आपराधिक केस लंबित होने पर सिपाही भर्ती से बाहर नहीं कर सकते

  3. टीजीटी हिंदी परीक्षा में एक प्रश्न के दो विकल्प सही माने गए

विधि संवाददाता, प्रयागराज। किरायेदारी विवाद में अपील दाखिल करने वाले किरायेदार को अब केवल अपील के समय तय देय किराये का 50 प्रतिशत जमा करना पर्याप्त नहीं होगा। अपील लंबित रहने तक हर महीने बनने वाले किराये का 50 प्रतिशत भी जमा करना होगा। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मासिक किराये की लगातार बनने वाली देनदारी को अपील दाखिल करने की तारीख पर फ्रीज नहीं किया जा सकता।

यह आदेश न्यायमूर्ति डॉ. योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव ने कानपुर नगर की मेसर्स राजस्थान मोटर्स की याचिका खारिज करते हुए दिया। याची ने अपर जिला जज कोर्ट नंबर-9 के 16 जुलाई के आदेश को चुनौती दी थी। अपीलीय अदालत ने 30 जनवरी को तय मासिक किराये का 50 प्रतिशत जमा करने का निर्देश दिया था।

याची के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि उप्र नगरीय परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 की धारा 35(1) के तहत अपील दाखिल करते समय 50 प्रतिशत राशि जमा कर दी गई थी, इसलिए दोबारा जमा कराने का आदेश उचित नहीं है। इसके विरोध में कहा गया कि कानून में संपूर्ण देय राशि से आशय उस किराये से है, जिसका दायित्व हर महीने बनता रहता है।

हाई कोर्ट ने कहा कि धारा 35 का परंतुक अपील के पोषणीय होने की अनिवार्य शर्त है। यदि मासिक देनदारी को अपील की तारीख पर रोक दिया जाए तो किरायेदार अपील लंबित रहने के दौरान बिना किराया दिए परिसर पर कब्जा बनाए रख सकता है। यह कानून के उद्देश्य के विपरीत होगा।

कोर्ट ने अपने पूर्व निर्णय हेमंत कुमार गर्ग बनाम पुलकित गर्ग का भी उल्लेख किया, जिसमें आवर्ती दायित्व होने पर अपील के दौरान भी जमा की बाध्यता जारी रहने की बात कही गई थी। कोर्ट ने अपीलीय अदालत के आदेश को वैधानिक प्रावधान के अनुरूप माना और याचिका खारिज कर दी।

सिर्फ आपराधिक केस लंबित होने पर सिपाही भर्ती से बाहर नहीं कर सकते: हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ आपराधिक मुकदमा लंबित होने के आधार पर किसी अभ्यर्थी को सिपाही भर्ती से बाहर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सिपाही भर्ती-2023 के चयनित अभ्यर्थी की अभ्यर्थिता निरस्त करने संबंधी एसपी मऊ का आदेश रद करते हुए यह टिप्पणी की है। न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की एकलपीठ ने सूरज कनौजिया की याचिका स्वीकार करते हुए यह आदेश दिया है।

याची के अधिवक्ता अभय प्रताप सिंह ने बताया कि उनका मुवक्किल लिखित परीक्षा और मेडिकल में सफल होकर सिविल पुलिस में चयनित हुआ था। चरित्र सत्यापन के दौरान पता चला कि कुशीनगर के थाना तुर्कपट्टी में उसके खिलाफ आबकारी अधिनियम की धारा 60 के तहत दर्ज मुकदमे में आरोप पत्र दाखिल है। इसी आधार पर जिलाधिकारी कुशीनगर ने उसके चरित्र सत्यापन की संस्तुति नहीं की। इसके बाद एसपी मऊ ने 26 अगस्त 2025 को उसकी अभ्यर्थिता निरस्त कर दी।

कोर्ट ने कहा कि एसपी मऊ ने केवल जिलाधिकारी और एसपी कुशीनगर की रिपोर्ट को आंख बंद कर स्वीकार कर लिया। उन्होंने न तो अपराध की प्रकृति पर विचार किया और न ही 28 अप्रैल 1958 के शासनादेश और सुप्रीम कोर्ट के अवतार सिंह केस के सिद्धांत के अनुसार स्वतंत्र विवेक का प्रयोग किया।

कोर्ट ने पाया कि एफआईआर में कोई स्वतंत्र गवाह नहीं था। एनसीआर केस की कभी विवेचना ही नहीं हुई। 30 मई 2021 की एफआईआर में पांच साल बाद भी ट्रायल पूरा नहीं हुआ और याची को 16 मई 2025 को जमानत मिल चुकी है। याची पर तथ्य छिपाने का भी कोई आरोप नहीं है। कोर्ट ने कहा कि उपयुक्तता तय करना नियुक्ति प्राधिकारी का अधिकार है, लेकिन विवेक का मनमाना प्रयोग होने पर दखल जरूरी है।

राजस्थान विद्युत निगम, चेतन जेफ और इम्तियाज मल्ला जैसे मामलों में दिए गए फैसले इस केस में लागू नहीं होते। कोर्ट ने 26 अगस्त 2025 का आदेश रद करते हुए एसपी मऊ को दो महीने में नए सिरे से आदेश पारित करने का निर्देश दिया है।

टीजीटी हिंदी में एक प्रश्न के दो विकल्प सही, छह को होगी हाई कोर्ट में सुनवाई

प्रशिक्षित स्नातक शिक्षक (टीजीटी) हिंदी भर्ती परीक्षा के विवादित प्रश्नों को लेकर दाखिल याचिकाओं पर इलाहाबाद हाई कोर्ट में छह अक्टूबर को सुनवाई होगी। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन ने ज्ञान सिंह यादव व 28 अन्य अभ्यर्थियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह तारीख तय की है। इस बीच उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग ने कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर प्रश्न संख्या 102 के दो विकल्पों को सही माना है।

आयोग ने बताया कि हिंदी विषय की उत्तर कुंजी को लेकर अभ्यर्थियों से मिली आपत्तियों के निस्तारण के लिए तीन सदस्यीय विशेषज्ञ समिति गठित की गई थी। समिति ने सात सितंबर को विवादित प्रश्नों की समीक्षा कर अपनी रिपोर्ट आयोग को सौंपी। इसमें प्रश्न संख्या 17, 91, 98, 104 और 105 के उत्तरों को सही माना गया। प्रश्न संख्या 102 को लेकर समिति ने आयोग की प्रारंभिक उत्तर कुंजी में बदलाव किया है।

आयोग ने पहले इस प्रश्न का विकल्प सी सही माना था, जबकि विशेषज्ञ समिति ने पुनरुक्ति को अर्थदोष और वाक्यदोष दोनों रूप में स्वीकार करते हुए विकल्प सी और डी दोनों को सही माना। इसी आधार पर दोनों विकल्पों को मान्य करने की बात कही गई है।

इस प्रश्न को लेकर संजीत सिंह की याचिका पर हाई कोर्ट पहले ही चयन आयोग से जानकारी मांग चुका है। याची के अधिवक्ता प्रफुल्ल देव शुक्ल ने बताया था कि प्रश्न में पूछा गया था कि पुनरुक्ति दोष किस श्रेणी का दोष है। इसके विकल्पों में रस दोष, छंद दोष, वाक्य दोष और अर्थ दोष दिए गए थे।

याची का कहना था कि अर्थ दोष सही उत्तर है, जबकि आयोग ने बाद में वाक्य दोष को भी सही मान लिया। सुनवाई के दौरान चयन आयोग के अधिवक्ता ने सभी संबद्ध याचिकाओं के अधिवक्ताओं को विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध कराने के लिए समय मांगा। कोर्ट अब छह अक्टूबर को मामले की आगे सुनवाई करेगा।

गैर सहायता प्राप्त संस्था में शिक्षक की बर्खास्तगी पर रिट याचिका पोषणीय नहीं : हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ट्रस्ट द्वारा संचालित निजी गैर-सहायता प्राप्त शिक्षण संस्था से शिक्षक की बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली याचिका संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत ग्राह्य (पोषणीय) नहीं है। नौकरी से हटाने का विवाद नियोक्ता और कर्मचारी के बीच सेवा संविदा से जुड़ा निजी विवाद है, जिसका निस्तारण रिट क्षेत्राधिकार में नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान ने आजमगढ़ निवासी नूतन राय की याचिका खारिज करते हुए यह आदेश दिया। नूतन राय द इंडियन ट्रस्ट फार रूरल हेरिटेज एंड डेवलपमेंट द्वारा संचालित शिक्षण संस्था में शिक्षक थीं। संस्था के प्रबंधन ने याचिका की पोषणीयता पर प्रारंभ में ही आपत्ति जताई थी।

याची की ओर से ‘अंदी मुक्ता सद्गुरु श्री मुक्ताजी वंदास स्वामी सुवर्ण जयंती महोत्सव स्मारक ट्रस्ट बनाम वीआर रुदानी’, ‘वीएसटी इंडस्ट्रीज बनाम वर्कर्स यूनियन’ और फुल बेंच के ‘उत्तम चंद रावत बनाम यूपी राज्य’ के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि सार्वजनिक कर्तव्य निभाने वाली निजी संस्था के खिलाफ रिट याचिका दाखिल की जा सकती है।

हाई कोर्ट ने कहा कि किसी निजी संस्था का रिट क्षेत्राधिकार के दायरे में आना और उसके खिलाफ किसी विशेष दावे का रिट में स्वीकार्य होना अलग-अलग बातें हैं। निजी संस्था सार्वजनिक कार्य करती हो, तब भी उसके साथ हुए प्रत्येक विवाद को अनुच्छेद 226 के तहत नहीं उठाया जा सकता। पीठ ने स्पष्ट किया कि शिक्षा देना सार्वजनिक कार्य माना जा सकता है, लेकिन शिक्षक को बर्खास्त करना संस्था और कर्मचारी के बीच सेवा संविदा से उत्पन्न विवाद है।

यह विशुद्ध रूप से निजी संविदात्मक दायित्व से जुड़ा मामला है, इसलिए रिट याचिका के जरिये राहत नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में संबंधित पक्ष के लिए सिविल कोर्ट या श्रम कानूनों के तहत उपलब्ध कानूनी उपाय खुले हैं। इसी आधार पर नूतन राय की याचिका को पोषणीय न मानते हुए खारिज कर दिया गया।

भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई में हीलाहवाली पर हाई कोर्ट नाराज

भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई में हीलाहवाली पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नाराजगी जताई है। कहा है कि यह रवैया बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने राजस्व विभाग के विशेष सचिव अरुण प्रकाश, संयुक्त सचिव धर्मेंद्र कुमार पाठक और जिलाधिकारी मैनपुरी को दो नवंबर को व्यक्तिगत रूप से पक्ष रखने को कहा है।

प्रवीण कुमार की जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह आदेश दिया है। मामला तीन अफसरों प्रशुन कश्यप, राकेश सोनी और आनंद सिंह के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई से संबंधित है। अदालत के 16 जुलाई के आदेश के क्रम में विभाग ने 31 अगस्त को बताया था कि दो अफसरों से स्पष्टीकरण लिया गया है और निर्णय लंबित है, जबकि एक की सुनवाई हो चुकी है।

गुरुवार को सुनवाई के दौरान शासन ने फिर 30 सितंबर की रिपोर्ट पेश की जो शब्दश: पिछली रिपोर्ट की नकल थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि निर्देश देने वाले अफसर बिना दिमाग लगाए काम कर रहे हैं और ऐसा लगता है कि अफसर भ्रष्टाचारियों से मिले हुए हैं।

अनुकंपा नियुक्ति से इन्कार करने वाला रेलवे का आदेश कैट में रद

केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) की इलाहाबाद पीठ ने ललितपुर निवासी याची सावन सिंह को अनुकंपा नियुक्ति देने से इनकार किए जाने संबंधी रेलवे का आदेश रद कर दिया है। न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति ओम प्रकाश (सप्तम) की पीठ ने रेलवे को निर्देश दिया है कि वह नियमानुसार पुनर्विचार कर तीन महीने में नया आदेश पारित करे।

ललितपुर के ग्राम लखिपुरा निवासी याची के पिता स्वर्गीय हर चरण उत्तर मध्य रेलवे झांसी मंडल में गैंगमैन थे। उनका निधन 19 जुलाई 2009 को हुआ, जब आवेदक की उम्र लगभग 26 वर्ष थी। आवेदक ने 2010, 2012 और 2013 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन दिए और 20 नवंबर 2014 को भी एक आवेदन किया। सुनवाई न होने पर उन्होंने अधिकरण का दरवाजा खटखटाया, जिसने 13 अगस्त 2018 को रेलवे को उनके आवेदन पर विचार करने का निर्देश दिया।

इसके बाद मंडल रेल प्रबंधक (कार्मिक) ने 13 नवंबर 2018 को उनका दावा खारिज कर दिया। रेलवे का तर्क था कि आवेदक केवल कक्षा आठ पास है, जबकि वेतन बैंड-1 (ग्रेड पे 1,800 रुपये) के पद के लिए न्यूनतम योग्यता 10वीं पास या आईटीआई है। रेलवे ने यह भी कहा कि आवेदक ने पांच साल की निर्धारित अवधि में दावा नहीं किया और अनुकंपा नियुक्ति केवल तात्कालिक आर्थिक राहत का साधन है।

आवेदक के अधिवक्ता एसडी द्विवेदी ने कहा कि रेलवे बोर्ड के पत्रों में तय योग्यता का गलत तरीके से उपयोग किया गया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आवेदन की तिथि पर प्रचलित योग्यता पर विचार होना चाहिए। पीठ ने इस बात को स्वीकार किया कि रेलवे ने यह नहीं बताया कि दावा लंबे समय तक लंबित रहा।

इस प्रकार, आवेदक को बाद में बदली शैक्षणिक योग्यता के आधार पर दावे के विचार से वंचित नहीं किया जा सकता। अधिकरण ने मूल आवेदन स्वीकार करते हुए 13 नवंबर 2018 का आदेश रद कर दिया और रेलवे को निर्देश दिया कि वह 2010 में दिए गए आवेदन की तिथि और सामग्री का सत्यापन कर दावे पर पुनर्विचार करे।