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13 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के प्रसव मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट सख्त, प्रमुख सचिव को दिए जांच के निर्देश

Published: Fri, 25 Sep 2026 12:59 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रयागराज में 13 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के 29 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने के आदेश ...और पढ़ें

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HighLights

  1. हाई कोर्ट ने 13 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के प्रसव पर नाराजगी जताई।

  2. गर्भपात आदेश का पालन न होने पर प्रमुख सचिव को जांच के निर्देश।

  3. पीड़िता के जीवन से खिलवाड़ मानते हुए दो सप्ताह में रिपोर्ट मांगी।

जागरण संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने प्रयागराज में 13 वर्षीय नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता का 29 सप्ताह का गर्भ समाप्त करने संबंधी अपने आदेश का पालन न होने और सिजेरियन डिलीवरी (प्रसव) कराए जाने पर नाराजगी जताई है।

न्यायमूर्ति अजित कुमार व न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने इसे अदालत के आदेश की जानबूझकर अवहेलना और पीड़िता के जीवन से खिलवाड़ मानते हुए प्रमुख सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य को स्वयं जांच कर दो सप्ताह में सीलबंद रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 12 अक्टूबर 2026 को होगी।

गर्भ 24 सप्ताह से अधिक होने के कारण मामला हाई कोर्ट में लाया गया। खंडपीठ ने 21 सितंबर 2026 को मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट देखी। इसमें गर्भावस्था करीब 29 सप्ताह दो दिन बताई गई। गर्भ जारी रखना व समापन, दोनों जोखिम भरा बताया गया था। पीड़िता की राय ली गई। उसने कहा, वह गर्भ नहीं रखना चाहती।

इस पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने 22 सितंबर 2026 को एसआरएन अस्पताल को सबसे सुरक्षित तरीके से गर्भपात करने का आदेश दिया। यह भी कहा कि पूरा खर्च राज्य सरकार उठाए। पीड़िता के परिवार ने 22 सितंबर को अर्जी देकर बताया कि आदेश का पालन नहीं हुआ।

इस पर कोर्ट ने 23 सितंबर की सुबह 10 बजे मामला सुना और स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग की विभागाध्यक्ष व मेडिकल सुपरिंटेंडेंट को दोपहर दो बजे बुलाया। प्रभारी विभागाध्यक्ष डा. वंदना ओझा ने बताया कि 22 सितंबर शाम गर्भपात प्रक्रिया शुरू की गई, जो विफल हो गई, इसलिए सिजेरियन प्रसव कराया गया। बच्चे को चिल्ड्रेन हास्पिटल में भर्ती किया गया है।

सर्जरी करने वाली डा. ऐमन अब्बासी यह नहीं बता सकीं कि सिजेरियन किसके आदेश पर किया? मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डा. नीलम सिंह ने कहा कि उन्होंने 11:30 बजे डा. अमृता चौरसिया को आदेश दिया था, लेकिन वह रात 12 बजे पटना के लिए निकल गईं। पीड़िता की मां ने शपथपत्र में आरोप लगाया कि अस्पताल में दवाओं, जांच और प्रक्रिया के लिए पैसे मांगे गए।

कोर्ट ने कहा कि पीड़िता 11 बजे ही विवेचक के साथ अस्पताल पहुंच गई थी, लेकिन रजिस्ट्रेशन शाम 4:45 बजे दिखाया गया, यानी सुबह से कोई प्रयास ही नहीं हुआ। डा. अमृता चौरसिया, डा. ऐमन अब्बासी और अन्य डाक्टर प्रथम दृष्टया जानबूझकर लापरवाही के दोषी हैं।

कोर्ट ने कहा, प्रमुख सचिव स्वयं सभी डाक्टरों, पीड़िता, उसकी मां और विवेचक से बात कर जांच करें। प्रसूता के पूरी तरह ठीक होने तक अस्पताल देखभाल करे। नवजात को चिल्ड्रेन हास्पिटल में रखा जाए, कोर्ट की अनुमति के बिना किसी को न सौंपा जाए। प्रसूता व नवजात के इलाज का पूरा खर्च अस्पताल उठाएगा।

सिर्फ 30 दिन के लिए अग्रिम जमानत क्यों, ट्रायल कोर्ट बताए : हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने तीन आरोपितों को केवल 30 दिनों के लिए अग्रिम जमानत दिए जाने संबंधी ट्रायल कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाते हुए संबंधित पीठासीन अधिकारी से उचित स्पष्टीकरण मांगा है। न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह की एकलपीठ ने आजमगढ़ के सुरेश यादव और दो अन्य की याचिका पर यह आदेश दिया है।

याचीगण का कहना है कि उसके खिलाफ लगे आरोप में सात साल से अधिक सजा का प्रविधान नहीं है। मामले में चार्जशीट पहले ही दाखिल हो चुकी थी और ट्रायल कोर्ट संज्ञान भी ले चुका था। इसके बावजूद अग्रिम जमानत मंजूर करते समय ट्रायल जज ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सुरक्षा केवल 30 दिनों के लिए ही क्यों दी जा रही है।

हाई कोर्ट ने कहा कि इस तरह के आदेश का परिणाम यह हो सकता है कि 30 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद आरोपित को फिर से जमानत के लिए आवेदन करना पड़े। हाई कोर्ट ने इसे अनावश्यक उत्पीड़न की स्थिति बताया। संबंधित ट्रायल जज ने तीन सितंबर 2026 को अपना स्पष्टीकरण दाखिल किया, लेकिन हाई कोर्ट उससे संतुष्ट नहीं हुआ।

अब हाई कोर्ट ने ट्रायल जज को तीन बिंदुओं पर उचित स्पष्टीकरण दाखिल करने का निर्देश दिया। जज से पूछा गया कि उन्होंने कितने मामलों में आरोपियों को 20, 30 या 40 दिनों जैसी सीमित अवधि के लिए जमानत दी है। इस मामले में ऐसी कौन सी विशेष परिस्थितियां हैं, जिनके आधार पर आरोपियों को केवल 30 दिनों की अग्रिम जमानत देना उचित समझा गया, जबकि अधिकतम सजा सात साल से कम थी और चार्जशीट दाखिल होने तक आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया गया।

तीसरा सवाल यह पूछा कि 30 दिनों की अवधि समाप्त होने के बाद आरोपितों से क्या अपेक्षा थी। क्या उन्हें ट्रायल जज के समक्ष आत्मसमर्पण कर दोबारा अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करना है। हाई कोर्ट ने यह भी दोहराया कि अदालत अग्रिम जमानत की अर्जी पर विचार करते समय या तो उचित शर्तों के साथ मुकदमे के निष्कर्ष तक सुरक्षा दे सकती है या अपराध की गंभीरता समेत प्रासंगिक परिस्थितियों पर विचार करने के बाद अर्जी खारिज कर सकती है। हाई कोर्ट ने तीनों आरोपितों को दी गई अंतरिम सुरक्षा आगे भी जारी रखने का निर्देश दिया है।

एनएचएम कर्मियों की तबादला नीति के लिए छह सप्ताह का समय
हाई कोर्ट के आदेश के बाद भी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) में कार्यरत संविदा कर्मियों के लिए तबादला नीति नहीं बनाए जाने पर दाखिल अवमानना याचिका पर अदालत ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने पूर्व के आदेश के अनुपालन के लिए स्वास्थ्य विभाग को छह सप्ताह का समय दिया है। एनएचएम में विभिन्न पदों पर कार्यरत संविदा कर्मियों के स्थानांतरण के लिए स्पष्ट नियम बनाने की मांग को लेकर 10 लोगों ने रिट याचिका दाखिल की थी।

इनमें सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ), स्टाफ नर्स और लैब टेक्नीशियन संवर्ग के कर्मचारी शामिल थे। हाई कोर्ट ने 29 अप्रैल को स्थानांतरण नीति बनाने का आदेश दिया था। छह जुलाई को इसमें संशोधन किया गया। इसके बावजूद आदेश पर अमल नहीं होने से अवमानना याचिका दाखिल की गई।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि स्थानांतरण नीति नहीं होने के कारण संविदा कर्मियों को अपने गृह जनपद से सैकड़ों किलोमीटर दूर तैनाती का सामना करना पड़ता है। मिशन निदेशक ने वर्ष 2024 में एक पत्र में स्थानांतरण नीति प्रचलन में होने की बात कही थी। इसके बावजूद अब तक स्पष्ट नीति नहीं बन सकी है।

याचिका में तथ्य नहीं लिखा है तो यह मौखिक बहस में अस्वीकार्य : हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि याचिका में जिन तथ्यों का उल्लेख नहीं किया गया, उन्हें मौखिक बहस के दौरान नहीं जोड़ा जा सकता। न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की एकलपीठ ने इस टिप्पणी के साथ मऊ के भीटी चौराहा स्थित देशी शराब की दुकान के लाइसेंस निरस्तीकरण के खिलाफ दायर रणधीर सिंह की याचिका को खारिज कर दिया है।

याची को 13 अगस्त 2020 को लाइसेंस मिला था, लेकिन 21 अक्टूबर 2020 को जिलाधिकारी के निरीक्षण में अनियमितताएं पाई गईं। इसके बाद 21 नवंबर 2020 को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और आइपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत एफआइआर दर्ज की गई। फिर 12 दिसंबर 2020 को लाइसेंस निरस्त कर दिया गया।

याची ने अपील की, लेकिन पांच अक्टूबर 2021 को यह खारिज हो गई, जिसके बाद वह हाईकोर्ट पहुंचा। याची के अधिवक्ता ने कहा कि आबकारी अधिनियम की धारा 74 के तहत अपराध शमनीय थे, इसलिए लाइसेंस रद करने के बजाय शमन किया जा सकता था। राज्य की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता रविशंकर पांडेय ने कहा कि याचिका में यह बात कहीं नहीं कही गई। कोर्ट ने इस दलील को मानते हुए याचिका खारिज कर दी।

40 सिविल जज ने पदोन्नति परीक्षा की कट आफ तिथि को हाई कोर्ट में दी चुनौती
इलाहाबाद हाई कोर्ट में उत्तर प्रदेश न्यायिक सेवा के 40 सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने उच्चतर न्यायिक सेवा में मेरिट के आधार पर पदोन्नति के लिए होने वाली परीक्षा से बाहर किए जाने को चुनौती दी है।

न्यायमूर्ति अरिंदम सिन्हा और न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की खंडपीठ ने आशुतोष तिवारी व 39 अन्य की याचिका की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट प्रशासन से जवाब मांगा है। मामले में अगली सुनवाई 25 सितंबर को होगी।

याचियों के अनुसार हाई कोर्ट के 14 अगस्त 2026 के नोटिस में पांच वर्ष की सेवा की गणना 31 दिसंबर 2024 की कट-आफ तिथि से की गई है। इस तिथि तक याचियों की सेवा पांच वर्ष से 18 दिन कम है, इससे वे परीक्षा के लिए अपात्र हो गए हैं। उनका तर्क है कि पांच वर्ष की शर्त चार जुलाई 2025 को अधिसूचित संशोधन से ली गई है, जबकि पदोन्नति उन रिक्तियों पर होनी है जो 31 दिसंबर 2024 तक थीं।

परीक्षा 27 सितंबर (रविवार) को होनी है, इसलिए उन्होंने अंतरिम राहत मांगी। हाई कोर्ट के अधिवक्ता ने कहा कि अधिकांश याचियों ने सीमित विभागीय प्रतियोगी परीक्षा में बिना कट-आफ तिथि पर आपत्ति जताए भाग लिया था और वे अगली भर्ती प्रक्रिया में पात्र होंगे।

खंडपीठ ने पूछा कि क्या याचियों को प्रशासन के पक्ष पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उन्हें रविवार की परीक्षा में बैठने दिया जा सकता है, हालांकि इससे उन्हें कोई अधिकार नहीं मिलेगा। इस पर वरिष्ठ अधिवक्ता शशि नंदन ने शुक्रवार तक हलफनामा दाखिल करने की बात कही। राज्य सरकार की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता अमित मनोहर ने भी पक्ष रखा।

पीड़ितों की अलग अपील न हो तो भी उचित मुआवजा दे सकती है अदालत : हाई कोर्ट
मोटर दुर्घटना मुआवजे के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पीड़ितों से मुआवजा बढ़ाने के लिए अलग अपील या क्रास आपत्ति दाखिल नहीं की गई हो, तब भी अपीलीय अदालत न्यायोचित मुआवजा देने के लिए राशि बढ़ा सकती है।

कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम लाभकारी कानून है और पीड़ितों व आश्रितों को उचित मुआवजा देना अदालत का दायित्व है। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील खारिज करते हुए अधिकरण का नौ जनवरी 2024 का आदेश संशोधित किया।

अधिकरण ने मृतक सभाजीत ताड़माली के परिवार को 7.20 लाख रुपये मुआवजा दिया था। हाई कोर्ट ने इसे बढ़ाकर 11,43,565 रुपये कर दिया। इस राशि पर सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज जारी रहेगा।

मामला 16 नवंबर 2017 की रात अंबेडकरनगर के बरियावन चौराहे के पास हुई दुर्घटना का है। स्कार्पियो की टक्कर से सभाजीत गंभीर रूप से घायल हुए थे और उपचार के दौरान उनकी मृत्यु हो गई। परिवार ने 49.70 लाख रुपये मुआवजे का दावा किया था।

बीमा कंपनी ने दलील दी कि दुर्घटना के समय वाहन चोरी हो चुका था और उसके मालिक या चालक के कब्जे में नहीं था, इसलिए कंपनी मुआवजा देने के लिए जिम्मेदार नहीं है।

हाई कोर्ट ने कहा कि वाहन चोरी होने के संबंध में न तो मालिक ने प्राथमिकी दर्ज कराई और न ही चोरी साबित करने वाला ठोस साक्ष्य पेश किया। इसलिए बीमा कंपनी की दलील स्वीकार नहीं की जा सकती। चालक के नाम में ‘मोहम्मद’ शब्द को लेकर उठाई गई आपत्ति को भी कोर्ट ने मामूली विसंगति माना।

मुआवजे की गणना में कोर्ट ने मृतक की मासिक आय पांच हजार से बढ़ाकर 7400.46 रुपये मानी, जो उस समय अकुशल श्रमिकों की न्यूनतम मजदूरी थी। परिवार रजिस्टर में जन्म वर्ष 1967 दर्ज होने के आधार पर मृतक की उम्र 50 वर्ष मानते हुए 13 का गुणक लगाया गया। पत्नी और दो बच्चों को कंसोर्टियम का हकदार मानकर प्रत्येक को 48,400 रुपये दिए गए।

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