केवल अंदेशे के आधार पर ही रद नहीं की जा सकती कोई वसीयत, इलाहाबाद HC का 54 साल पुराने मामले में महत्वपूर्ण फैसला
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि पंजीकृत वसीयत को केवल अंदेशे के आधार पर रद्द नहीं किया जा ...और पढ़ें

इलाहाबाद उच्च न्यायालय।
HighLights
कोर्ट ने कहा, 50 से 200 रुपये के मनीआर्डर भेजना दादा के प्रति प्रेम का प्रमाण नहीं
आजमगढ़ जनपद में संपत्ति विवाद मामले में निर्णय
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक निर्णय में कहा है कि पंजीकृत वसीयत को केवल अंदेशा के आधार पर रद नहीं किया जा सकता। न्यायमूर्ति सिद्धार्थनंदन की एकलपीठ ने 54 साल पुराने वसीयत विवाद में आजमगढ़ निवासी भानुदत्त पाठक की द्वितीय अपील खारिज करते हुए कहा कि केवल पिता का वृद्ध होना यह साबित नहीं करता कि पुत्र हावी था और उसने विश्वास के रिश्ते का दुरुपयोग कर वसीयत लिखवा ली। वृद्ध ने पोते को संपत्ति से बेदखल कर छोटे बेटे के पक्ष में वसीयत की है।
मनीआर्डर भेजना दादा के प्रति प्रेम का निर्णायक प्रमाण नहीं
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि वसीयत में पोते को संपत्ति से अलग करने का स्पष्ट कारण दर्ज है। पोते ने दादा और पुश्तैनी घर की देखभाल नहीं की, जबकि वसीयतकर्ता ने उसकी पढ़ाई और उसे अमेरिका भेजने में खर्च किया था। पोता 1949 से सरकारी सेवा के कारण बाहर रहा और पत्नी-बच्चों को भी साथ ले गया। इसके विपरीत वृद्ध पिता की सेवा छोटे बेटे ने की। ऐसे में उसके पक्ष में संपत्ति करना अपने आप में संदेह का आधार नहीं है। कोर्ट ने यह भी कहा कि पोते द्वारा 50 से 200 रुपये के मनीआर्डर भेजना दादा के प्रति प्रेम का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने वसीयत वैध ठहराया
कोर्ट ने वसीयत वैध ठहराते हुए कहा कि वादी यह साबित नहीं कर सका कि वसीयतकर्ता अस्वस्थ मस्तिष्क के थे। संयुक्त परिवार में माता-पिता अंत तक बच्चों की देखभाल करते हैं और बच्चे भी सेवा करते हैं, इसलिए केवल साथ रहने से अनुचित प्रभाव नहीं माना जा सकता। अपील पोते ने दायर की थी। इससे पहले 1973 में सिविल वाद दायर कर अपने दादा शंकर दत्त पाठक द्वारा छह दिसंबर 1971 को लिखी गई वसीयत को रद करने और आधी संपत्ति में बंटवारे की मांग की थी।
वसीयत छोटे बेटे के पक्ष में थी
शंकर दत्त पाठक का निधन वसीयत के छह माह बाद मई 1972 में हो गया था। वसीयत छोटे बेटे हरि दत्त पाठक के पक्ष में थी, जबकि वादी बड़े बेटे केशव दत्त के लड़के हैं। ट्रायल कोर्ट ने 26 जुलाई 1979 को यह मानते हुए वसीयत रद कर दी थी कि वसीयतकर्ता वृद्ध और कमजोर दिमाग के थे तथा गांव का कोई गवाह नहीं है। पोते से प्रेम होने के बावजूद उसे उत्तराधिकार से बाहर करना संदिग्ध है। प्रथम अपीलीय अदालत ने 28 अगस्त 1980 को ट्रायल कोर्ट का फैसला पलट दिया।
गवाह ने क्या कहा?
इसके खिलाफ भानुदत्त ने अपील दायर की। हाई कोर्ट में 19 जुलाई 2022 को अधिकांश पक्षकारों में समझौता हो गया, जिसका सत्यापन 22 दिसंबर 2022 को अपर जिला जज, आजमगढ़ ने भी कर दिया था। प्रतिवादी ने समझौता नहीं किया और अपील का विरोध किया। हाई कोर्ट ने प्रतिवादी के खिलाफ अपील को गुण-दोष पर सुना। कोर्ट ने पाया कि वसीयत पंजीकृत है। गवाह योगेन्द्र नाथ दीक्षित ने कहा कि वसीयतकर्ता ने खुद पढ़कर हस्ताक्षर किए थे।
