अवैध हिरासत को बाद की गिरफ्तारी से वैध नहीं किया जा सकता, इलाहाबाद हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण आदेश
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश में कहा कि प्रारंभिक अवैध हिरासत को बाद की औपचारिक गिरफ्तारी से वैध नहीं ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट।
HighLights
हाई कोर्ट ने कैद याची की तत्काल रिहाई व 30 हजार मुआवजा देने का दिया निर्देश
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका मंजूर, प्रयागराज में यमुनापार के सोरांव इलाके का मामला
विधि संवाददाता, जागरण, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की प्रारंभिक हिरासत अवैध है तो बाद में की गई औपचारिक गिरफ्तारी और रिमांड भी वैध नहीं मानी जा सकती। न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने यह टिप्पणी रवि चौरसिया की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका मंजूर करते हुए की है।
30 हजार मुआवजा देने का भी आदेश
हाई कोर्ट ने याची को रिहा करने के साथ ही 30 हजार रुपये मुआवजा भी देने का आदेश दिया है। मुआवजे की वसूली अवैध हिरासत के लिए जिम्मेदार अधिकारियों से की जाएगी। याची को प्रयागराज की सोरांव पुलिस ने 14 सितंबर को अयोध्या से हिरासत में लिया, लेकिन उस समय कोई औपचारिक गिरफ्तारी नहीं दिखाई गई।
रवि को न्यायिक हिरासत में भेजा गया था
याची की मां 15 सितंबर को खैरियत जानने के लिए थाने में गई। इसके बाद 16 सितंबर को पुलिस ने याची को सुबह 10:45 बजे औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया और रोजनामचे में गिरफ्तारी दर्ज की। इसके बाद मेडिकल टेस्ट करा कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जहां से रवि को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया।
गिरफ्तारी की शुरुआत ही अवैध हिरासत से शुरू हुई
कोर्ट ने कहा याची को रिमांड के लिए ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना 24 घंटे से अधिक समय तक पुलिस हिरासत में रखा गया। यदि किसी व्यक्ति को अवैध तरीके से हिरासत में लेने के बाद गिरफ्तार किया जाता है तो वह गिरफ्तारी भी अवैध हो जाती है। इसके साथ ही ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट द्वारा रिमांड की कार्यवाही भी अमान्य हो जाती है, क्योंकि गिरफ्तारी की शुरुआत ही अवैध हिरासत से हुई थी, जिससे उसके अनुच्छेद 22 के तहत अधिकारों का उल्लंघन हुआ।
सोरांव थानाध्यक्ष के व्यवहार पर कोर्ट नाराज
कोर्ट ने कहा की प्रारंभिक अवैध हिरासत ‘जहरीला पेड़’ है और उससे जुड़ी बाद की कार्रवाइयां उसका ‘फल’, पुलिस को अवैध हिरासत के बाद गिरफ्तारी को वैध बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। सोरांव थानाध्यक्ष के व्यवहार पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि उसकी लापरवाही पाई जाती है तो इसे उनके सर्विस रिकार्ड में दर्ज किया जाए। कोर्ट ने याची को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया, बशर्ते वे किसी अन्य मामले में वांछित न हों।
