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शादीशुदा को दूसरे व्यक्ति से विवाह करने व लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का अधिकार नहीं, इलाहाबाद HC का महत्वपूर्ण निर्णय

By shyam mishra Edited By: Brijesh Srivastava
Published: Sun, 22 Mar 2026 08:26 PM (GMT+05:30)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि शादीशुदा व्यक्ति को दूसरे से विवाह या लिव-इन में रहने का अधिकार नहीं है। ...और पढ़ें

इलाहाबाद हाई कोर्ट की फाइल फोटो।

इलाहाबाद हाई कोर्ट की फाइल फोटो। 

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने पुलिस सुरक्षा व संरक्षण देने से किया इन्कार

  2. ऐसे संबंधों को पुलिस सुरक्षा प्रदान नहीं की जाएगी।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि शादी या लिव-इन रिलेशनशिप के लिए दो वयस्क इंसानों की सहमति जरूरी है। किसी को ऐसे दो वयस्कों की निजी स्वतंत्रता में दखल देने का अधिकार नहीं है। यह स्वतंत्रता पूर्ण या असीमित नहीं है, कुछ प्रतिबंधों के अधीन है। 

तलाक की डिक्री प्राप्त करनी होगी

कोर्ट ने कहा विवाहित जीवन साथी के जीवित रहते उससे तलाक लिए बगैर किसी को तीसरे व्यक्ति के साथ शादी करने या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने की कानूनी अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्हें अपनी वैध शादी के बाहर विवाह करने अथवा लिव-इन रिलेशनशिप में प्रवेश करने से पहले सक्षम क्षेत्राधिकार वाले न्यायालय से तलाक की डिक्री प्राप्त करनी होगी।

पहली शादी के रहते कोई और विवाह करना जुर्म 

यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने शांति देवी व अन्य की याचिका को निस्तारित करते हुए दिया है। कोर्ट ने पहले से शादीशुदा याची को दूसरे याची से लिव इन रिलेशनशिप में रहने की अनुमति देने से इन्कार कर दिया। न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के हवाले से कहा- कोई अनव्याही संगिनी शादी जैसा रिश्ता नहीं रख सकती। शादीशुदा होने पर एक से अधिक पत्नी या पति रखने का रिश्ता अथवा दूसरी शादी के जरिए रिश्ता जो उसका पति या पत्नी नहीं है, इसे विवाह जैसा संबंध नहीं कहा जा सकता। हिंदुओं में एक से ज्यादा शादी अपराध है। पहली शादी के रहते हुए कोई और विवाह करना जुर्म माना जाएगा।

हाई कोर्ट ने यह भी कहा

कोर्ट ने कहा कि उस व्यक्ति पर अपनी मर्जी के बावजूद किसी दूसरे धर्म में धर्म बदलने पर दो शादियों के जुर्म के लिए केस चलाया जा सकता है। दो बालिग कानूनी शादी करने के काबिल नहीं हैं, जिसमें अविवाहित होना भी शामिल है। ऐसे मामलों में समादेश याचिका जारी नहीं की जा सकती।

ऐसे याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा नहीं दी जा सकती

कोर्ट ने कहा याचिकाकर्ताओं को सुरक्षा प्रदान नहीं की जा सकती, जो लिव-इन रिलेशनशिप में होने का दावा करते हैं। कहा, यदि याचिकाकर्ताओं को कोई परेशान करता है अथवा उनके साथ किसी प्रकार की हिंसा की जाती है, तो वे एक अभ्यावेदन प्रस्तुत करके संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक/पुलिस अधीक्षक से संपर्क कर सकते हैं।

सरकारी वकील ने कहा

यह अपेक्षा की जाती है कि ऐसे अभ्यावेदन की प्राप्ति पर, संबंधित प्राधिकारी उसकी विषय-वस्तु का सत्यापन करेगा। याचिका में याचियों ने अपने शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में किसी के हस्तक्षेप करने पर रोक लगाने तथा पुलिस सुरक्षा की मांग की गई थी। सरकारी वकील ने प्रतिवाद किया कि याची एक शादीशुदा महिला हैं, अभी तक तलाक नहीं हुआ है। इसलिए उसे दूसरे के साथ शादी करने या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का अधिकार नहीं है। उसे पुलिस संरक्षण पाने का भी अधिकार नहीं है।

जहां दूसरे व्यक्ति का वैधानिक अधिकार शुरू होता है, वहीं व्यक्ति की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है। किसी एक को अपने दूसरे जीवनसाथी का साथ पाने का वैधानिक अधिकार है। निजी स्वतंत्रता के नाम पर उस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। दूसरे जीवनसाथी के वैधानिक अधिकार का उल्लंघन करने के लिए ऐसी कोई सुरक्षा प्रदान नहीं की जा सकती। इसलिए एक व्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे के कानूनी अधिकार का अतिक्रमण या उस पर भारी नहीं पड़ सकती।
- इलाहाबाद हाई कोर्ट