पासपोर्ट सत्यापन में दर्ज हो केस की मौजूदा स्थिति, सिर्फ क्राइम नंबर काफी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डीजीपी को निर्देश दिया है कि पासपोर्ट आवेदनों के पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में आपराधिक कार्यवाही की ...और पढ़ें
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HighLights
पासपोर्ट सत्यापन में आपराधिक केस की मौजूदा स्थिति स्पष्ट करें।
डीजीपी को चार्जशीट व संज्ञान की जानकारी देने का निर्देश।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अनुपालन हलफनामा दाखिल करने को कहा।
विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) को निर्देश दिया है कि पासपोर्ट आवेदनों के लिए तैयार पुलिस सत्यापन रिपोर्ट में आपराधिक कार्यवाही की मौजूदा स्थिति स्पष्ट की जाए। बताया जाए कि अदालत में चार्जशीट दाखिल हुई है या नहीं, अदालत ने उसका संज्ञान लिया है या नहीं और चार्जशीट की वर्तमान स्थिति क्या है। चार्जशीट दाखिल न हुई हो तो इसका भी उल्लेख हो। क्लोजर रिपोर्ट पर मजिस्ट्रेट के आदेश और मुकदमा शुरू होने की स्थिति भी बताई जाए।
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने यह आदेश देते हुए कहा कि केवल केस क्राइम नंबर या चार्जशीट का विवरण देना पर्याप्त नहीं है। पुलिस सत्यापन फार्म में सभी जरूरी जानकारी शामिल करने के साथ डीजीपी को रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया। प्रकरण में अगली सुनवाई चार नवंबर को होगी।
कोर्ट ने गोरखपुर निवासी सुरेश यादव उर्फ गीता सरन की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह निर्देश दिया। याची ने पासपोर्ट फिर से जारी करने की मांग की थी। आपराधिक मामले से जुड़ी पुलिस सत्यापन रिपोर्ट के कारण उनका आवेदन 12 मई से लंबित था। राज्य सरकार के वकील ने बताया कि जांच के बाद याची के खिलाफ क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की गई, जबकि सह-आरोपित राम ध्यान के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हुई।
राज्य ने यह भी पुष्टि की कि याचिकाकर्ता का कोई आपराधिक इतिहास नहीं है। कोर्ट ने क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी को शैक्षिक रिकार्ड, जन्मतिथि, नाम और अन्य विवरणों की जांच कर आवेदन पर निर्णय लेने के लिए कहा है। आदेश की प्रमाणित प्रति पेश होने के छह सप्ताह के भीतर आवेदन का निपटारा किए जाने का निर्देश दिया गया है।
निर्णय से पहले आरोप में धारा जोड़ने का ट्रायल कोर्ट को अधिकार: हाई कोर्ट
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बस्ती के अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा आरोप में हत्या के प्रयास की धारा जोड़ने संबंधी आदेश को सही ठहराते हुए अभियुक्त राघवेंद्र प्रताप सिंह की याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की एकलपीठ ने यह आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा है कि सीआरपीसी की धारा 216 अदालत को निर्णय सुनाए जाने से पहले किसी भी समय आरोप बदलने अथवा जोड़ने का अधिकार देती है। चिकित्सक ने चोट को आग्नेयास्त्र से लगी बताया और घायल बबलू ने भी गोली लगने की बात कही। ऐसे में धारा 307 के आरोप के समर्थन में प्रथमदृष्टया साक्ष्य मौजूद हैं।
थाना गौर, जिला बस्ती में 19 मई, 2021 को एफआइआर दर्ज हुई थी। शिकायतकर्ता के अनुसार 16 मई, 2021 की शाम करीब सात बजे सिकरी चौराहे पर सब्जी खरीदते समय राजनीतिक रंजिश के चलते आरोपियों ने गाली-गलौज कर धमकी दी। घर लौटते समय रामनरेश के घर के पास आरोपियों ने उसे लाठी-डंडों से पीटा। आरोप है कि राघवेंद्र ने तमंचे से गोली चलाई। बचाने आए मनोज शर्मा को भी पीटा गया।
विवेचना के बाद पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया। पांच अभियुक्तों को दो अगस्त 2021 को विभिन्न धाराओं के तहत तलब किया गया, जबकि धारा 307 शामिल नहीं थी। शिकायतकर्ता ने आठ अगस्त 2022 को सीआरपीसी की धारा 216 के तहत आरोप में धारा 307 जोड़ने की अर्जी दी। इसे आठ सितंबर 2022 को समय से पहले बताते हुए खारिज कर दिया गया। 22 सितंबर, 2022 को आरोप तय हुए और ट्रायल शुरू हुआ। गवाही दर्ज होने के बाद ट्रायल कोर्ट ने चार जून 2026 को धारा 307 जोड़ दी। इसी आदेश को चुनौती दी गई थी।
गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय में 2020 से आडिट नहीं, हाई कोर्ट ने मुख्य सचिव से मांगा हलफनामा
गौतमबुद्ध विश्वविद्यालय, नोएडा में वर्ष 2020 से आडिट नहीं होने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया है। कोर्ट ने मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी से व्यक्तिगत हलफनामा मांगा है। निर्देश का पालन नहीं होने पर मुख्य सचिव को स्वयं उपस्थित होना होगा। मामले की अगली सुनवाई दो नवंबर को होगी।
न्यायमूर्ति विक्रम डी. चौहान ने मुदित कुमार की याचिका पर यह आदेश दिया। सुनवाई के दौरान याची ने कहा कि विवादित राशि पहले से ही विश्वविद्यालय के खाते में दर्ज है। इसके बावजूद वह सदाशयता के तहत 2.70 लाख रुपये तीन दिन में ट्रायल कोर्ट में जमा करने को तैयार हैं। कोर्ट ने इसकी अनुमति देते हुए धनराशि फिक्स्ड डिपाजिट में रखने का निर्देश दिया।
सुनवाई में विश्वविद्यालय में 2020 से आडिट नहीं होने की जानकारी दी गई। विश्वविद्यालय के अधिवक्ता ने स्वीकार किया कि हर वर्ष आडिट होना चाहिए। उन्होंने बताया कि नए कुलपति ने राज्य सरकार को पत्र लिखकर आडिट कराने का अनुरोध किया है और प्रक्रिया चल रही है। कोर्ट ने रजिस्ट्रार (अनुपालन) को आदेश की प्रति तत्काल मुख्य सचिव को भेजने का निर्देश दिया है।
