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'6 साल का बच्चा मां से दूर रहकर नहीं कर सकता समझदारी भरी पसंद'; इलाहाबाद HC ने आगरा फैमिली कोर्ट का फैसला पलटा

By Jagran NewsEdited By: Sachin Sharma
Published: Sat, 17 Oct 2026 07:54 AM (IST)

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया है कि मां से लंबे समय तक दूर रखे गए छह साल के बच्चे ...और पढ़ें

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HighLights

  1. छह साल के बच्चे की पसंद कस्टडी का आधार नहीं।

  2. मां से लंबे समय तक दूर रखने पर बच्चे की पसंद अमान्य।

  3. हाई कोर्ट ने मां को बच्चे की कस्टडी सौंपी, कल्याण सर्वोपरि।

विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि मां से लंबे समय तक दूर रखे गए कम उम्र के बच्चे की पसंद को अभिरक्षा तय करने का निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता। छह साल का बच्चा अपने भावनात्मक और शारीरिक हितों को समझकर स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम नहीं होता।

अदालत ने आगरा फैमिली कोर्ट का फैसला रद कर बच्चे की कस्टडी तत्काल मां को सौंपने का आदेश दिया है। दादी को बच्चे से मिलने का अधिकार भी दिया गया है। न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की खंडपीठ ने कहा कि बच्चे की इच्छा को उस पृष्ठभूमि से अलग नहीं देखा जा सकता, जिसमें उसे लंबे समय तक मां से मिलने नहीं दिया गया।

अदालत ने आशंका जताई कि इस अवधि में बच्चा प्रभावित हुआ हो सकता है।मामले से जुड़े तथ्य ये हैं कि महिला के पति की 2020 में मृत्यु हुई थी। उस समय उनका बेटा आठ महीने का था। महिला का आरोप था कि बीमा दावा दिलाने के नाम पर उनसे खाली कागज पर हस्ताक्षर कराए गए और बाद में उसका इस्तेमाल कथित फर्जी समझौता तैयार करने में हुआ।

इस समझौते में बच्चे को दादी के पास रखने की बात थी। महिला ने आरोप लगाया कि इसके बाद उन्हें बेटे से मिलने नहीं दिया गया। महिला ने संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धाराओं 7 और 25 के तहत फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे खारिज कर दिया गया।

दादी ने दावा किया कि मां ने बच्चे को छोड़ दिया था और वह उनके साथ रहने का आदी है। उन्होंने बच्चे के बयान, कथित समझौते और पिता की वसीयत का हवाला दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि अभिरक्षा में बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है और मां-बच्चे का प्राकृतिक संबंध महत्वपूर्ण है।

गीता हरिहरन बनाम भारतीय रिजर्व बैंक मामले का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा कि पिता की मृत्यु के बाद मां प्राकृतिक संरक्षक है। दोनों पक्षों की आर्थिक स्थिति में ऐसा अंतर नहीं था जिससे मां को कस्टडी से वंचित किया जाए। अदालत ने मां की अपील स्वीकार कर ली।

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