बांस की खेती से किसानों की जिंदगी हुई खुशहाल, 'हरा सोना' बना आय का जरिया; जल संरक्षण को भी मिला मुकाम
प्रतापगढ़ में 'हरा सोना' यानी बांस की खेती किसानों के लिए समृद्धि और आय का नया जरिया बन गई है। ...और पढ़ें

रैबीरजानीपुर में खेत में तैयार बांस: जागरण
HighLights
बांस की खेती 'हरा सोना' बनकर किसानों को समृद्ध कर रही है।
यह खेती सई नदी के किनारे जल संरक्षण में सहायक सिद्ध हुई।
बंबूसा बालकोआ और डेंड्रोकैलामस स्ट्रिक्स बांस की विदेशों में मांग।
प्रवीन कुमार यादव, प्रतापगढ़। बदलाव सबसे बड़ी सच्चाई है। जलवायु में तेजी से हो रहे परिवर्तन से जो क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित हुआ है, वह है खेती। ऐसे में इसको लाभकारी बनाए रखने के लिए यहां भी बदलाव जरूरी है। बांस की खेती उनमें से एक है।
बांस यानी हरा सोना। बांस की खेती न केवल खुशहाली लाने का काम किया है, बल्कि ग्रामीणों की आर्थिक स्थिति को भी सुदृढ़ करने का काम किया है।जिले में बहुत कुछ बदलाव हो है। जल संरक्षण को समृद्धि मिलने के बाद आय का जरिया भी बनी है।
बांस की खेती से भी बेल्हा की पहचान
बेल्हा की पहचान राजा रजवाड़ों और अमृतफल से है, लेकिन अब बांस की खेती से भी अब इसकी पहचान होने लगी है। एक दो किसानों की शुरू हुई खेती से अब कई गांव इसका हब बन चुके हैं। खास बात यह है कि इस खेती ने जहां पानी की बचत कर रही है, वहीं आय का भी बढ़िया साधन बनीं।
हम बात कर रहे हैं संडवा चंद्रिका के रैबीरजानीपुर निवासी पूरन खंडेलवाल की। इन्होंने वर्ष 2020 में गांव में 30 बीघे खेत में बांस की खेती शुरू की। अब बांस तैयार हो गया है। इसके जरिये हर साल लाखों रुपये की आमदनी भी हो रही है।
खेती से प्रेरित होकर गांव के ही बद्री प्रसाद वर्मा, अख्तर और साहिल समेत दर्जन भर किसानों ने भी खेती के जरिये किस्मत आजमाई। आखिर खेती ने रंग लाई तो जीवन खुशहाल हो गया।इससे अच्छी खासी आय भी हो रही है। बांच की खेती से सई नदी के पानी का कटाव भी रुका है। जल संरक्षण की दिशा में भी यह बेहतर कदम है।
विदेशों तक छाया बंबूसा बालकोआ संग डेंड्रोकैलामस स्ट्रिक्स बांस
वैसे तो जिले में दर्जन भर प्रजापति के बांस की खेती हुई है, लेकिन इसमें बंबूसा बालकोआ संग डेंड्रोकैलामस स्ट्रिक्स बांस की अधिक खेती हुई है। खास बात यह है इन बांसों की खपत पश्चित बंगाल और मध्य प्रदेश में अधिक है। एजेंटों के जरिये यह बांस कनाडा समेत आधा दर्जन दूसरे देशों में भी भेजा जाता है। दरअसल, कागज उद्योग और एथेनाल उद्योग जो लगा है।
खास बातें
- बांस का फर्नीचर, बोर्ड, हस्तशिल्प तथा चारकोल निर्माण में हो रहा उपयोग
- बांस की कोपलों, फ्लोरिंग और पैनल बनाने में किया जाता है है इस्तेमाल
- अगरबत्ती स्टिक, चटाई, बुने हुए उत्पाद और कागज उद्योग में भी उपयोगी
- बांस का पौधा 40 से 120 साल तक हर साल दे सकता है उत्पादन
- एक पौधे से कम से कम आठ बांस हैं निकलते, एक एकड़ में 500 पौधे
- एक एकड़ में चार हजार बांस होता है उत्पादन, मिट्टी और प्रबंधन पर निर्भर
बांस की खेती शुरू की तो चिंता सता रही थी कि कहीं नुकसान न हो जाए। इस खेती के जरिये बेहतर आमदनी हो रही है।
-ललित शर्मा, चौबेपुर
बांस की खेती में खर्च कम आया था, जबकि आय अधिक हो रही है। अब इस खेती को और विस्तार देने की कवायद चल रही है।
-पूरन खंडेलवाल, रैबीरजानीपुर
बांस की खेती किसानों के लिये सिर्फ पारंपरिक खेती नहीं, बल्कि एक अच्छा करियर और कारोबार का जरिया बन गई है।
-शैलेश मिश्र, उमरी
