राज नारायण शुक्ल राजन, प्रतापगढ़ : जिस उम्र में युवा महंगे मोबाइल रखते हैं, ब्रांडेड कपड़े पहनते हैं, उस उम्र में रोहित जगत जननी की मूर्ति गढ़ते हैं। वह भी चंदे से नहीं, बल्कि जेब खर्च बचाकर। अपने पैसे थोड़े-थोड़े बचाकर वह धागे, मिट्टी, रंग खरीदते हैं। युवाओं को कुछ रचनात्मक करने की सीख देते हैं।

बीए में पढ़ रहा यह युवा कलाकार नहाने के साबुन से भी मां की छवि को आकार दे देता है। आटे की लोई से भी कला के रंग दिखा देता है। पुराने अखबारों को पानी में भिगोकर, सूप बनाने वाली सलाइयों को जोड़कर और धागे से भी मूर्ति बना देता है। शहर के पुराना माल गोदाम रोड के रोहित हेला के पिता फूलचंद्र अर्दली हैं। बड़े भाई पवन हेला जिला स्टेडियम में फुटबाल के कोच हैं। दस साल पहले साबुन की टिकिया को यूं ही काटने के दौरान उसके बनते विविध आकार देख मूर्ति गढ़ने की सोच विकसित हुई। पहले साबुन से मां की मूर्ति बनाई, फिर किचेन में रोटी बनाने को गूंथकर रखे गए आटे को ले जाकर कला को निखारा।

इनकी कला को घर व मोहल्ले वालों ने सराहा, मदद करने लगे तो पंखों को आकाश मिला। अब रोहित हर साल करीब पांच फिट की मूर्ति गढ़कर उसे सार्वजनिक स्थान पर स्थापित करते हैं, जिसमें लोग पूजन-अर्चन करते हैं। कभी महाकाल का रौद्र रूप तो कभी कान्हा का नटखट स्वरूप भी उनकी कला का विषय होता है। प्रतापगढ़ में कोलकाता से आने वाले मूर्तिकार ही नवरात्र में मूर्ति बनाते रहे हैं। इस कलाकार ने साबित किया है कि कलाकार की कोई जाति नहीं होती, कोई एक प्रांत नहीं होता। कला है तो वह फूलों की तरह महकेगी।

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नारी सम्मान का संदेश

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रोहित कहते हैं कि मूर्ति गढ़कर वह हर घर में व समाज में नारी के सम्मान का संदेश देना चाहते हैं। वह कहते हैं कि नवरात्र का मतलब केवल जयकारे नहीं, नारी के प्रति आदर का संकल्प भी है। भ्रूण में कन्या को न मारा जाए, इस तरह की बात सबको समझाना चाहते हैं। मूर्ति कला के साथ ही इनको कहानी, कविता लेखन, मिमिक्री, नृत्य, संगीत, अभिनय में भी रुचि है।

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