पीलीभीत : दम तोड़ रहा है। इस कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए योगी सरकार ने बांसुरी को वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ओडीओपी) योजना के अंतर्गत शामिल कर लिया लेकिन अभी तक इस कुटीर उद्योग को इस योजना के माध्यम से कुछ भी हासिल नहीं हो सका है। बांसुरी बनाने वाले कारीगरों के सामने सबसे बड़ी समस्या बांस को मंगाने की है। यह बांस असम के सिल्चर से आता है। इसे यहां के जंगल में उगाने की योजना बनी लेकिन ठंडे बस्ते में चली गई। सरकार की तरफ से कोई राहत पैकेज भी नहीं मिला। ऐसे में बांसुरी बनाने वाले कारीगर निराश हैं। तराई के इस छोटे से शहर को बांसुरी ने बड़ी पहचान दिलाई थी। एक जमाना था, जब यहां की बनी बांसुरी प्रख्यात बांसुरी वादक हरि प्रसाद चौरसिया और रेनू मजूमदार तक को भाती थी। प्रदेश में विभिन्न अवसरों पर लगने वाले मेलों में पीलीभीत की बांसुरी की मांग रहती थी। दरअसल बांसुरी बनाने के काम आने वाला बांस असम के सिल्चर से आता है। पहले मीटर गेट रेलवे लाइन असम में भी थी और पीलीभीत तक सीधे बांस का जाता था। बाद में जब यह सुविधा खत्म हो गई तो बांस मंगाने में खर्च बहुत बढ़ गया और धीरे धीरे यह कुटीर उद्योग दम तोड़ने लगा। प्रदेश सरकार ने जब एक जिला एक उत्पाद योजना में इस जिले से बांसुरी को शामिल किया तो कारीगरों में बेहतरी की उम्मीद जगी लेकिन अभी तक उन्हें कुछ हासिल नहीं हो सका। बांसुरी कारोबारी इकरार मियां कहते हैं कि बांसुरी वाला बांस यहां के जंगल में उगाने की योजना भी फलीभूत नहीं हो सकी। सरकार की ओर से भी कुछ नहीं किया जा रहा है। जिला उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन केंद्र के उपायुक्त मयाराम सरोज का कहना है कि जल्द ही विभाग की ओर से बांसुरी शिल्पियों के लिए योजना शुरू होगी।

Posted By: Jagran