पीलीभीत (जेएनएन)। हे राम मैने जीते जी तुम्हें अपनी लंका में प्रवेश नहीं करने दिया अब मैं तुम्हारे धाम जा रहा हूं रोक सकते हो रोक लो, शंकर भगवान जी की जय। लगभग कुछ इसी तरह के संवादों को बोलते एक नहीं तीन-तीन रावण की भूमिका निभाने वाले चिर निद्रा में लीन हो गए। बीसलपुर में हो रहे ऐतिहासिक रामलीला मेले में रावण की भूमिका निभाने वाले पात्रों के लीला का मंचन करते समय अपने प्राणों को त्यागने के इतिहास ने मेले को अलग पहचान दी और इसी के चलते यहां का मेला पूरे देश में अपनी एक अलग पहचान बनाए हुए है।मेले में रावण की भूमिका निभाने वाले मुंशी छेदालाल का देहावसान वर्ष 1962 में ठीक विजयदशमी के दिन लीला परिसर में लीला खेलते समय हो गया था। यह आश्चर्यजनक जरूर है, लेकिन सत्य है, जिसकी पुनरावृत्ति तीन बार हो चुकी है। रावण की भूमिका निभाने वाले मोती महाराज की मृत्यु भी दशहरा वाले दिन वर्ष 1978 में उसी समय मेला मैदान में हुई थी, जिस समय रावण मारा गया था।

अनोखी थी गंगा विष्ण की प्राणत्याग लीला

इसी प्रकार वर्ष 1987 में मोहल्ला दुर्गाप्रसाद निवासी गंगा विष्णु रस्तोगी उर्फ कल्लूमल ने रावण वध लीला के उस समय प्राण त्याग दिये। जब वे दशहरा महोत्सव में भगवान राम से युद्ध कर रहे थे। राम द्वारा रावण वध लीला का मंचन करते समय जब रावण यह संवाद कह रहे थे। अब मैं तुम्हारे धाम जा रहा हूं , शंकर भगवान की जय- उद्घोष के साथ गंगा विष्णु ने प्राण त्या दिए। उनकी मृत्यु पर मेला ग्राउंड में मौजूद एक लाख से अधिक मेलार्थियों को विश्र्वास नहीं हुआ था। हर तरफ चर्चाएं थीं। 

अजब घटनाओं से मेले की गजब पहचान

गंगा विष्णु  की प्राण त्याग लीला प्रदेश के समय पुलिस अधिकारी बृजलाल जिले के पुलिस अधीक्षक के रूप में कार्यरत थे। उनके समाने ही घटित हुई थी। सच्चाई यही थी कि गंगा विष्णु भगवान शिव के बचपन से ही अनन्य भक्त थे। कल्लूमल की मृत्यु के बाद उनके पुत्र दिनेश रस्तोगी लंबे समय से रावण की भूमिका अदा कर रहे है। कुल मिलाकर मेले में रावण का पात्र अदा करने वाले तीन पात्रों की दशहरा महोत्सव पर हुई मृत्यु की ऐतिहासिक घटनाओं से मेले की अपनी अलग पहचान बनायी है।

Posted By: Nawal Mishra