प्लेसमेंट के 99% आंकड़े से आगे भी है असली कहानी, कॉलेज चुनते समय इन बातों की करें पड़ताल
कॉलेज चुनने का मानदंड अब केवल डिग्री या प्लेसमेंट नहीं, बल्कि छात्रों को बदलते उद्योग के लिए तैयार करने वाली ...और पढ़ें

कॉलेज अनुभवात्मक शिक्षण और उद्योग जुड़ाव पर ध्यान दे रहे हैं।
HighLights
उद्योग को अब सिर्फ डिग्री नहीं, व्यावहारिक कौशल चाहिए।
कॉलेज अनुभवात्मक शिक्षण और उद्योग जुड़ाव पर ध्यान दे रहे हैं।
प्लेसमेंट आंकड़े नहीं, करियर निर्माण की गुणवत्ता देखें।
जागरण संवाददाता, नोएडा। सालों से, कॉलेज चुनने का मतलब मुख्य रूप से डिग्री चुनना होता था। अब यह सोच बदल रही है। जिस तेजी से इंडस्ट्रीज़ बदल रही हैं, उसे देखते हुए एम्प्लॉयर अब सिर्फ एकेडमिक क्वालिफिकेशन के आधार पर हायरिंग नहीं कर रहे हैं। ऐसे कैंडिडेट्स की मांग है जो मुश्किल समस्याओं को समझ सकें, टेक्नोलॉजी में हो रहे बदलावों के हिसाब से खुद को ढाल सकें और पहले दिन से ही काम में योगदान दे सकें।
इस बात ने स्टूडेंट्स और पेरेंट्स के संस्थानों को परखने के तरीके पर भी असर डाला है। अब सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि किस कॉलेज की रैंकिंग सबसे अच्छी है, बल्कि यह भी है कि वहां का एकेडमिक माहौल लंबे समय में बदलाव के हिसाब से ढलने की क्षमता को कितना बढ़ावा देता है। इस दबाव के कारण, कई संस्थान पारंपरिक, पैसिव क्लासरूम-बेस्ड मॉडल से हटकर ऐसे फ्रेमवर्क बना रहे हैं जहां प्रैक्टिकल एप्लीकेशन थ्योरेटिकल लर्निंग को सपोर्ट करता है।
करिकुलम से आगे का एक फ्रेमवर्क
यह बदलाव अलग-अलग संस्थानों में अलग-अलग रूप ले रहा है। कुछ ने क्रॉस-डिसिप्लिनरी प्रोग्राम शुरू किए हैं, कुछ ने इंडस्ट्री के साथ सर्टिफिकेशन पार्टनरशिप की है, और कुछ ने कैंपस के अंदर ऐसे प्लेटफॉर्म बनाए हैं जहां स्टूडेंट्स रियल-वर्ल्ड प्रोजेक्ट्स पर काम करते हैं।
नोएडा स्थित IMS नोएडा इसी तरह के संस्थानों का एक उदाहरण है। यह संस्थान अपने कैंपस में 'सलाम नमस्ते कम्युनिटी रेडियो' चलाता है जिसे सूचना और प्रसारण मंत्रालय से लाइसेंस मिला है। इसके जरिए जर्नलिज्म, मैनेजमेंट, लॉ और टेक्नोलॉजी जैसे अलग-अलग क्षेत्रों के स्टूडेंट्स कंटेंट क्रिएशन, कम्युनिटी कैंपेन, रिसर्च और स्टेकहोल्डर कम्युनिकेशन में शामिल होते हैं। ऐसे प्लेटफॉर्म की अहमियत स्टूडेंट्स को एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया देने में है न कि सिर्फ कभी-कभार होने वाले फील्ड विजिट जैसे अनुभव जिसमें गलतियां करने और उनसे सीखने की गुंजाइश हो।
आसान शब्दों में कहें तो, करिकुलम में इंडस्ट्री-मान्यता प्राप्त सर्टिफ़िकेशन और लाइव प्रोजेक्ट्स को शामिल करने के पीछे भी यही सोच है। आखिरी सेमेस्टर तक इंतजार करने के बजाय पहले साल से ही प्रैक्टिकल असाइनमेंट शुरू करने का मकसद स्टूडेंट्स को शुरू से ही मार्केट की भाषा से परिचित कराना है।
टीचर की भूमिका में बदलाव
इस मॉडल में टीचर की भूमिका में भी बदलाव आता है। सिर्फ लेक्चर देने वालों के बजाय, ऐसे फैकल्टी सदस्यों की ज़रूरत है जिनके पास एकेडमिक रिसर्च क्रेडेंशियल और मौजूदा इंडस्ट्री का अनुभव दोनों हों, ताकि क्लासरूम में होने वाली चर्चाएं मार्केट की असलियत से जुड़ी रहें। असल में, ज्यादातर संस्थानों के लिए यह सबसे मुश्किल पहलू साबित होता है, क्योंकि दोनों तरह का अनुभव रखने वाले एजुकेटर्स की संख्या सीमित है।
प्लेसमेंट के आंकड़ों की सीमाएं
संस्थागत सफलता मापने का पैमाना भी 'प्लेसमेंट डे' की अवधारणा से आगे बढ़ रहा है। एक बार की भर्ती प्रक्रिया के बजाय जोर अब कई वर्षों तक चलने वाले करियर निर्माण पर है, जिसमें तकनीकी सर्टिफिकेशन, व्यवहार संबंधी आकलन और बाजार के साथ निरंतर संपर्क शामिल हैं।
यहां एक सावधानी जरूरी है। प्लेसमेंट प्रतिशत के आंकड़े लगभग हमेशा संस्थान द्वारा स्वयं घोषित होते हैं और अलग-अलग संस्थान इन्हें अलग-अलग तरीके से गिनते हैं। कुछ केवल प्लेसमेंट में बैठे विद्यार्थियों को आधार बनाते हैं, कुछ पूरे बैच को। आईएमएस नोएडा अपना प्लेसमेंट रिकॉर्ड 99 प्रतिशत बताता है और कहता है कि उसके विद्यार्थियों ने कंसल्टिंग, बैंकिंग, टेक्नोलॉजी, मीडिया, मैन्युफैक्चरिंग, कानूनी सेवाओं और वित्तीय संस्थानों में अवसर हासिल किए हैं। किसी भी संस्थान के मामले में अभिभावकों के लिए उपयोगी सवाल यह होता है कि आंकड़े में औसत पैकेज, भूमिका का स्तर और दो साल बाद की स्थिति क्या रही।
तकनीकी दक्षता से आगे
करियर की तैयारी सिर्फ तकनीकी कौशल नहीं है। इसके लिए स्वायत्तता, दृढ़ता और सीखते रहने की आदत भी जरूरी है। वेंचर इनक्यूबेशन, हैकाथॉन, मीडिया फेस्टिवल, खेल और विद्यार्थियों द्वारा संचालित प्रतिस्पर्धी मंच इसी दिशा में काम करते हैं। कैंपस एक छोटे बाजार की तरह काम करता है, जहां विद्यार्थी अपने विचार परखते हैं और सहयोगात्मक नेतृत्व सीखते हैं। खेल के ढांचे और छात्रवृत्तियों को भी कई संस्थान अब इसी तर्क से देखते हैं, क्योंकि अनुशासन और टीमवर्क जितने कक्षा में विकसित होते हैं, उतने ही मैदान पर भी।
उल्लेखनीय है कि तेजी से बदलती दुनिया में उच्च शिक्षा का मूल्यांकन अकेले रैंकिंग, बुनियादी ढांचे या प्लेसमेंट आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। असली कसौटी यह है कि संस्थान विद्यार्थी को पूरे करियर के दौरान ढलने, नेतृत्व करने और प्रभाव पैदा करने के लिए कितना तैयार करता है। जो संस्थान अकादमिक कठोरता को उद्योग से जुड़ाव और अनुभवात्मक शिक्षण के साथ जोड़ पाएंगे, वही इस बदलाव में प्रासंगिक रहेंगे। विद्यार्थियों के लिए सलाह सीधी है। ब्रोशर के दावों से आगे जाकर यह पूछें कि पढ़ाई के दौरान असल काम कितना मिलेगा।
