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न झूले की पींग, न मल्हार की तान... हरियाली तीज से दूर होती जा रही नई पीढ़ी

Published: Sat, 15 Aug 2026 03:16 AM (IST)

आधुनिकता और इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के कारण हरियाली तीज जैसे पारंपरिक त्योहारों का महत्व कम हो रहा है, जिससे ...और पढ़ें

आधुनिकता और इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के कारण हरियाली तीज जैसे पारंपरिक त्योहारों का महत्व कम हो रहा है। इमेज एआई

आधुनिकता और इंटरनेट के बढ़ते प्रभाव के कारण हरियाली तीज जैसे पारंपरिक त्योहारों का महत्व कम हो रहा है। इमेज एआई

HighLights

  1. आधुनिकता से हरियाली तीज जैसे त्योहारों का महत्व घट रहा है।

  2. झूला, मल्हार, कजरी जैसी पुरानी परंपराएं अब ग्रामीण क्षेत्रों में नहीं।

  3. इंटरनेट, टीवी से युवा पीढ़ी भारतीय संस्कृति से विमुख हो रही।

घनश्याम पाल, बिलासपुर। भारतीय संस्कृति में विभिन्न तीज-त्योहारों और रीति-रिवाजों का बहुत महत्व है। श्रावण मास में हरियाली तीज के उत्सव का अलग महत्व होता है। तीज के त्योहार पर महिलाएं झूला झूलती है और मल्हार व कजरी गाती हैं। तीज के त्योहार पर युवा कुश्ती, कबड्डी, दौड़ आदि खेल खेलते हैं जबकि महिलाएं झूला झूलती हैं। बच्चों के लिए पकवान बनाती हैं। हरियाली तीज पर कहानी सुनाती हैं।

नव विवाहिता की ससुराल से सुहागी आती है, जबकि विवाहिता स्त्रियों के मायके से सिंदारे आता है। लेकिन आज की भागदौड़ भरी जदगी में ये पुराने रीति रिवाज गुम होते जा रहे हैं। इस त्योहार पर आधुनिकता का असर दिखाई दे रहा है। झूला, मल्हार, कजरी आदि का ग्रामीण क्षेत्रों में नामोनिशान तक नजर नहीं आ रहा है।

इंटरनेट, टीवी आदि के चलते आज युवा पीढ़ी भारतीय संस्कृति को भूलती जा रही है। भारतीय संस्कृति को बचाने के लिए सचेत नहीं हुए तो आने वाले समय में रीति-रिवाज इतिहास में गुम हो जाएंगे।

भारतीय संस्कृति आपसी भाईचारे का संगम होता था। महिलाएं ऐसे त्योहारों पर एक जगह एकत्रित होकर एक टोली में मल्हार, कजरी गीत गाकर झूला झूलते थीं, अब किसी भी त्योहार पर यह एकता दूर-दूर तक नजर नहीं आती।

-शांति देवी

बुजुर्गो का कहना है कि महान संगीतकार तानसेन के गुरु बाबा हरिदास मल्हार गाते थे, जिन्हें सुनकर बादल बारिश लेकर आते थे। आज के भागदौड़ भरी ¨जदगी में लोगों के लिए इस तरह के तीज त्योहारों का कोई महत्व नहीं रह गया। महिलाएं भी इन त्योहारों को भूलती जा रही हैं।
-पूनम

ग्रामीण क्षेत्र में हरियाली तीज का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता था। महिलाएं पेड़ों पर झूला झूलती थीं, लेकिन आज की युवा पीढ़ी इस परंपरा को भूलती जा रही हैं।

-शारदा

वर्तमान समय में इंटरनेट, फेसबुक आदि के बढ़ते प्रचलन के चलते महिलाएं भी तीज जैसे पारंपरिक त्योहार को भूलती जा रही हैं। लोग भारतीय संस्कृति से विमुख होते जा रहे हैं। हरियाली तीज हाथ मेंहदी रचाने तक सिमटती जा रही है।

-वंदना।