अर्पित त्रिपाठी, ग्रेटर नोएडा :

एक तरफ देश को विश्व गुरु बनाने का संकल्प लिया जाता है। बौद्धिक शक्ति के बल पर चांद तक हम पहुंच गए हैं। विकास के नए कीर्तिमान गढ़े जा रहे हैं, ज्ञान-विज्ञान से घिरे हुए हैं। इस सबके के बावजूद चुनावी दौर के दौरान जाति ही सबसे बड़ा मुद्दा उभर के सामने आता है। चुनाव के इतर हर कोई विकास, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, संचार आदि बिदुओं पर केंद्रित रहता है, लेकिन चुनाव आते ही इन बिदुओं और जनहित से मुद्दों को एक तरफ कर दिए जाता है। टिकट का बंटवारा भी जातीय समीकरण के आधार पर किया जाता है। किस क्षेत्र में किस वर्ग की बहुलता है कौन सी जाति और वर्ग किस दूसरे वर्ग को भी अपना मतदान देगा इसी गणित में हर कोई उलझा नजर आता है। ऐसे में राज्य व देश के विकास को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के कसीदे गौण नजर आने लगते हैं। राजनैतिक दल हो या या जनता हर पक्ष के लिए जाति अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। हालांकि लोगों का मानना है कि पहले की तुलना में आज के दौर में जाति का मुद्दा उतना मजबूत नहीं रह गया है, लेकिन ये भी है कि इसे पूरी तरह से जाने में अभी दशकों लगेंगे। इसकी शुरुआत लोगों को घर से ही करनी होगी। जब तक हम बच्चों को जातिगत भेदभाव को लेकर शिक्षित और उन्हें इस सोच से दूर नहीं करेंगे तब तक इस व्यवस्था को समाप्त नहीं कर सकेंगे। समाज भी जब तक योग्यता को तरजीह नहीं देगा, तब तक बदलाव आसान नहीं है।

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चुनाव आते ही जातिगत मुद्दा इसलिए और अहम हो जाता है कि संचार के सभी संसाधनों में हर वर्ग की संख्या की तुलना होने लगती है। लोग इससे जुड़ने लगते है, जो राजनीति के लिए जरूरी है। इस व्यवस्था को समाप्त होने में समय लगेगा और लोग योग्यता को प्राथमिकता देंगे।

- डा. आनंद आर्या, उपाध्यक्ष, आर्य प्रतिनिधि सभा

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जाति और वर्ग ये उत्तर प्रदेश व बिहार में अधिक है। मैं खुद एक बड़े राजनैतिक संगठन से 45 साल जुड़ा रहा, लेकिन मेरी योग्यता को दरकिनार कर जाति विशेष को तवज्जो दी गई। पिछले दिनों भी एक राजनैतिक दल ने टिकट देने का पूरा भरोसा दिया, लेकिन आखिरी वक्त में जातिगत समीकरण आड़े आ गए। सोच में बदलाव ही इस व्यवस्था का समाप्त कर सकेगा।

- पितांबर शर्मा, अध्यक्ष, अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा

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इसकी शुरुआत घर से ही होने लगती है। बचपन से ही जाति व वर्ग को बांटकर दिखाया जाने लगता है। बच्चों की परवरिश के दौरान उन्हें इस सोच से दूर करना होगा। थोड़ा बदलाव देखने को मिला है, लेकिन इस व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त होने में 50 साल लग सकते हैं।

- अशोक श्रीवास्तव, अध्यक्ष, नवरत्न फाउंडेशन

Edited By: Jagran